
मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसे इस्लाम के सबसे पवित्र महीनों में गिना जाता है। यह महीना केवल नए हिजरी वर्ष की शुरुआत का प्रतीक नहीं है, बल्कि त्याग, बलिदान, धैर्य, न्याय और मानवता की रक्षा के लिए किए गए संघर्ष की याद भी दिलाता है। दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान मुहर्रम को गहरे सम्मान और श्रद्धा के साथ याद करते हैं। खासकर 10 मुहर्रम, जिसे यौम-ए-आशूरा कहा जाता है, इस्लामी इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक कर्बला की त्रासदी से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि मुहर्रम का महीना केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि यह इंसानियत और नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए किए गए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक भी माना जाता है।वर्ष 2026 में मुहर्रम का महीना चांद दिखाई देने के आधार पर जून के मध्य में शुरू होने की संभावना है। इस्लामी कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित होता है, इसलिए इसकी तारीखें हर साल ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार बदलती रहती हैं। अनुमान है कि 2026 में 10 मुहर्रम यानी आशूरा 26 जून के आसपास पड़ सकता है, हालांकि अंतिम तारीख चांद दिखने पर निर्भर करेगी। मुहर्रम का महत्व मुख्य रूप से कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है जिसने पूरी दुनिया को न्याय और सत्य के लिए संघर्ष का संदेश दिया। यह घटना आज से लगभग 1400 वर्ष पहले वर्ष 680 ईस्वी में हुई थी। उस समय इस्लामी दुनिया में राजनीतिक और धार्मिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही थीं। यजीद सत्ता में था और वह चाहता था कि सभी लोग उसकी सत्ता और नेतृत्व को स्वीकार करें। लेकिन पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन ने अन्याय और गलत नीतियों के सामने झुकने से इनकार कर दिया। उनका मानना था कि सत्ता का उद्देश्य लोगों की सेवा और न्याय की स्थापना होना चाहिए, न कि भय और दबाव के माध्यम से शासन करना।

इमाम हुसैन हजरत अली और हजरत फातिमा के पुत्र थे। उन्हें इस्लामी इतिहास में साहस, ईमानदारी, न्यायप्रियता और मानवता का प्रतीक माना जाता है। जब उन्होंने यजीद के प्रति निष्ठा की शपथ लेने से इंकार कर दिया तो उनके सामने कठिन परिस्थितियां खड़ी कर दी गईं। इसके बावजूद उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। यही वह निर्णय था जिसने आगे चलकर कर्बला की महान लेकिन दर्दनाक कहानी को जन्म दिया।इतिहास के अनुसार इमाम हुसैन अपने परिवार और कुछ साथियों के साथ मदीना से निकले और कूफा की ओर बढ़े। रास्ते में उन्हें कर्बला नामक स्थान पर रोक लिया गया। वहां यजीद की विशाल सेना ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। इमाम हुसैन के साथ केवल कुछ दर्जन लोग थे, जबकि दूसरी ओर हजारों सैनिक मौजूद थे। इसके बावजूद उन्होंने अन्याय के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। कर्बला की घटना का सबसे दर्दनाक पहलू यह था कि इमाम हुसैन के काफिले को पानी तक से वंचित कर दिया गया। रेगिस्तान की भीषण गर्मी में छोटे-छोटे बच्चे और महिलाएं प्यास से तड़पती रहीं। कई दिनों तक उन्हें पानी नहीं दिया गया, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने सिद्धांतों का साथ नहीं छोड़ा। यह घटना आज भी दुनिया भर के लोगों को भावुक कर देती है।10 मुहर्रम यानी आशूरा के दिन कर्बला के मैदान में अंतिम युद्ध हुआ। इमाम हुसैन के साथी एक-एक करके शहीद होते गए। उनके परिवार के कई सदस्य भी इस संघर्ष में मारे गए। उनके भाई हजरत अब्बास, बेटे हजरत अली अकबर और छह महीने के मासूम बेटे हजरत अली असगर भी इस त्रासदी का हिस्सा बने। अंत में इमाम हुसैन स्वयं भी शहीद हो गए, लेकिन उन्होंने अन्याय और अत्याचार के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।

कर्बला की यह घटना केवल एक धार्मिक संघर्ष नहीं थी। यह अच्छाई और बुराई, न्याय और अन्याय, सत्य और असत्य के बीच की लड़ाई थी। इसी कारण आज भी इमाम हुसैन का नाम केवल मुसलमानों के बीच ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में न्याय और मानवाधिकारों के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उनका बलिदान यह संदेश देता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, इंसान को अपने सिद्धांतों और मूल्यों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।मुहर्रम के दौरान दुनिया भर में लोग कर्बला की इस घटना को याद करते हैं। विभिन्न देशों में मजलिसों का आयोजन होता है, जहां इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का वर्णन किया जाता है। लोग उनके जीवन से प्रेरणा लेते हैं और उनके द्वारा दिए गए संदेश को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं। कई स्थानों पर ताजिया जुलूस निकाले जाते हैं और शांति, भाईचारे तथा मानवता के संदेश को आगे बढ़ाया जाता है।भारत में भी मुहर्रम का विशेष महत्व है। लखनऊ, हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, भोपाल, पटना और वाराणसी सहित कई शहरों में बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। लोग कर्बला की याद में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और समाज में एकता तथा सद्भाव का संदेश देते हैं। मुहर्रम केवल शोक का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन और नैतिक मूल्यों को मजबूत करने का समय भी माना जाता है।आशूरा के दिन रोजा रखने की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। कई मुसलमान इस दिन या इसके आसपास रोजा रखते हैं और विशेष इबादत करते हैं। इसे आध्यात्मिक शुद्धि और अल्लाह के प्रति समर्पण का माध्यम माना जाता है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार यह दिन इंसान को अपने जीवन का मूल्यांकन करने और अच्छे कार्यों की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।

मुहर्रम का संदेश किसी एक समुदाय या धर्म तक सीमित नहीं है। यह पूरी मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है। कर्बला की कहानी हमें सिखाती है कि शक्ति और सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण सत्य और न्याय होते हैं। इमाम हुसैन का बलिदान यह याद दिलाता है कि इतिहास उन्हीं लोगों को सम्मान देता है जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हैं।आज जब दुनिया विभिन्न चुनौतियों और संघर्षों का सामना कर रही है, तब कर्बला का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। यह हमें सिखाता है कि अन्याय का विरोध करना, कमजोरों की रक्षा करना और सत्य के मार्ग पर चलना ही वास्तविक मानवता है। यही कारण है कि मुहर्रम केवल इस्लामी नववर्ष की शुरुआत नहीं, बल्कि साहस, त्याग, धैर्य और इंसाफ की अमर गाथा के रूप में पूरी दुनिया में याद किया जाता है।
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