कानपुर उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी चुनावी रणनीतियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में मिले झटके के बाद भारतीय जनता पार्टी अब पूरी तरह संगठनात्मक और सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की दिशा में जुट गई है। समाजवादी पार्टी ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA फार्मूले के दम पर जिस तरह इस क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन किया, उसके बाद भाजपा भी सामाजिक संतुलन को नई रणनीति के केंद्र में रख रही है।कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र की 10 लोकसभा सीटों में 2024 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने छह सीटों पर जीत दर्ज कर भाजपा को बड़ा झटका दिया था। यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि वर्ष 2019 में भाजपा ने इसी क्षेत्र की सभी 10 सीटों पर कब्जा जमाया था। ऐसे में बदले राजनीतिक समीकरण ने भाजपा नेतृत्व को संगठन और सामाजिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर नए सिरे से रणनीति बनाने के लिए प्रेरित किया है।भाजपा अब केवल चुनावी प्रचार पर नहीं, बल्कि संगठन की जड़ों को मजबूत करने पर भी जोर दे रही है। पार्टी का मानना है कि विधानसभा चुनाव में सफलता के लिए सामाजिक संतुलन सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकता है। इसी सोच के तहत पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और सामान्य वर्ग के बीच बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की तैयारी की जा रही है। पार्टी की कोशिश है कि संगठन का हर स्तर समाज के सभी वर्गों की भागीदारी को दर्शाए, ताकि सभी समुदायों में समान संदेश जाए।कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है। इसमें कानपुर नगर, अकबरपुर, फतेहपुर, बांदा, कन्नौज, इटावा, फर्रुखाबाद, जालौन, झांसी और हमीरपुर जैसी महत्वपूर्ण लोकसभा सीटें शामिल हैं। वर्तमान में इनमें से छह सीटों पर समाजवादी पार्टी और चार सीटों पर भाजपा का कब्जा है। वहीं इस पूरे क्षेत्र में विधानसभा की कुल 52 सीटें हैं, जिनमें वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 40 सीटों पर जीत दर्ज की थी। पार्टी अब इस बढ़त को बरकरार रखने के साथ-साथ 2024 जैसी स्थिति दोबारा बनने से रोकना चाहती है।

इसी रणनीति के तहत भाजपा ने मई महीने में प्रदेश मंत्रिमंडल का विस्तार भी किया था। मंत्रिमंडल में कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र से पिछड़ा वर्ग के पांच, अनुसूचित जाति वर्ग के तीन और ब्राह्मण समाज के एक विधायक को मंत्री बनाकर सामाजिक संतुलन का संदेश देने का प्रयास किया गया। इसके बाद संगठन में भी इसी फार्मूले को आगे बढ़ाया गया।भाजपा ने क्षेत्र के एक ओबीसी नेता को प्रदेश पिछड़ा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया, जबकि कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र का अध्यक्ष भी पिछड़ा वर्ग से नियुक्त किया गया। इसके अलावा पिछड़ा और अनुसूचित जाति वर्ग के कई नेताओं को प्रदेश संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर पार्टी ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि आने वाले चुनाव में सामाजिक प्रतिनिधित्व उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा।हाल ही में नियुक्त क्षेत्रीय अध्यक्ष राम किशोर साहू ने भी अपने पदभार संभालने से पहले पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्ष एवं विधान परिषद सदस्य मानवेंद्र सिंह से मुलाकात की। इस दौरान आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति और संगठन को मजबूत बनाने पर चर्चा हुई। इसके बाद उन्होंने लखनऊ पहुंचकर प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, प्रदेश महामंत्री (संगठन) धर्मपाल और पिछड़ा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश पाल से भी शिष्टाचार भेंट की। पार्टी नेताओं का कहना है कि 29 जून से क्षेत्रीय संगठन पूरी सक्रियता के साथ चुनावी तैयारियों में जुट जाएगा।हालांकि संगठन के भीतर एक चर्चा यह भी है कि इस बार प्रदेश कार्यकारिणी में कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र से सामान्य वर्ग के नेताओं को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। ऐसे में पार्टी अब क्षेत्रीय कार्यकारिणी के गठन के दौरान पिछड़ा और अगड़ा दोनों वर्गों के बीच संतुलन स्थापित करने की तैयारी कर रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि क्षेत्रीय कार्यकारिणी में लगभग 31 प्रमुख पद होते हैं और कोशिश रहेगी कि सभी वर्गों को उचित भागीदारी मिले। इससे संगठनात्मक संतुलन भी बना रहेगा और चुनावी संदेश भी मजबूत होगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने PDA रणनीति के जरिए लोकसभा चुनाव में उल्लेखनीय सफलता हासिल की, जबकि भाजपा अब उसी चुनौती का जवाब संगठनात्मक सोशल इंजीनियरिंग के जरिए देने की तैयारी में है। पार्टी का फोकस केवल जातीय समीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने, नए सामाजिक समूहों को जोड़ने और पुराने वोट बैंक को बनाए रखने पर भी है।आने वाले महीनों में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच सामाजिक समीकरणों की यह राजनीतिक लड़ाई और तेज होने की संभावना है। एक ओर सपा अपने PDA फार्मूले को और मजबूत करने में जुटी है, तो दूसरी ओर भाजपा संगठन में संतुलित प्रतिनिधित्व और व्यापक सामाजिक भागीदारी के जरिए 2027 के विधानसभा चुनाव में मजबूत वापसी की रणनीति पर काम कर रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सामाजिक संतुलन की यह नई राजनीतिक बिसात उत्तर प्रदेश की चुनावी तस्वीर को किस हद तक प्रभावित करती है।
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