ऑकलैंड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चार दशक बाद न्यूजीलैंड की आधिकारिक यात्रा पर पहुंचे हैं। करीब 40 वर्षों के अंतराल के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब भारत और न्यूजीलैंड के रिश्ते नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं। दोनों देशों के बीच हाल ही में हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA), इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते रणनीतिक सहयोग, निवेश, रक्षा, शिक्षा और तकनीक जैसे क्षेत्रों में साझेदारी ने इस यात्रा को बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ऑकलैंड में न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे, जिसमें व्यापार विस्तार से लेकर वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक सहयोग तक कई अहम मुद्दों पर चर्चा होगी।यह यात्रा केवल एक राजनयिक मुलाकात नहीं, बल्कि भारत की बदलती वैश्विक भूमिका और न्यूजीलैंड के साथ भविष्य की दीर्घकालिक साझेदारी का संकेत भी मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौरे से दोनों देशों के आर्थिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक रिश्तों को नई दिशा मिलेगी।

क्यों खास है प्रधानमंत्री मोदी का न्यूजीलैंड दौरा?
प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा इसलिए ऐतिहासिक मानी जा रही है क्योंकि इससे पहले वर्ष 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने न्यूजीलैंड का दौरा किया था। इसके बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की आधिकारिक यात्रा नहीं हुई। लगभग चार दशक बाद हो रहा यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है, जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की राजनीति तथा वैश्विक व्यापार में उसकी भूमिका लगातार मजबूत हुई है।न्यूजीलैंड भी भारत को भविष्य के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदारों में देख रहा है। यही कारण है कि दोनों देश अब संबंधों को पारंपरिक सहयोग से आगे बढ़ाकर व्यापक आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी में बदलने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।

क्या होंगे वार्ता के प्रमुख मुद्दे?
ऑकलैंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के बीच होने वाली बैठक में व्यापार, निवेश, रक्षा सहयोग, शिक्षा, कृषि, तकनीक, पर्यटन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी।दोनों देशों के बीच हाल ही में संपन्न मुक्त व्यापार समझौते को प्रभावी तरीके से लागू करने, निवेश बढ़ाने और भारतीय कंपनियों के लिए न्यूजीलैंड में नए अवसर पैदा करने पर भी विशेष फोकस रहेगा। इसके अलावा दोनों नेता वैश्विक चुनौतियों, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को मजबूत बनाने और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी विचार-विमर्श करेंगे।

भारत-न्यूजीलैंड रिश्तों की मजबूत नींव
भारत और न्यूजीलैंड के संबंध दशकों पुराने हैं। दोनों देश कभी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहे और आज भी कॉमनवेल्थ के सदस्य हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था, कानून का शासन, अंग्रेजी भाषा और खेलों के प्रति साझा रुचि दोनों देशों को एक-दूसरे के करीब लाती है।दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध 1952 में स्थापित हुए थे, जबकि व्यापारिक संपर्क इससे पहले ही शुरू हो चुके थे। पिछले सात दशकों में दोनों देशों ने राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग को लगातार मजबूत किया है।
भारत क्यों बनता जा रहा है न्यूजीलैंड का अहम साझेदार?
न्यूजीलैंड भारत को केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में देखता है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, विशाल उपभोक्ता बाजार और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक भूमिका ने भारत को न्यूजीलैंड की विदेश नीति का अहम केंद्र बना दिया है।इसी सोच के तहत न्यूजीलैंड ने वर्षों पहले भारत को प्राथमिकता वाले देशों में शामिल किया और कई दीर्घकालिक रणनीतियां तैयार कीं। इनका उद्देश्य व्यापार, निवेश, शिक्षा, कृषि और तकनीकी सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना है।
FTA से खुलेगा नए अवसरों का द्वार
दोनों देशों के बीच हाल ही में हुआ मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement) इस यात्रा का सबसे बड़ा आधार माना जा रहा है। इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में पहले से कहीं बेहतर पहुंच मिलेगी। साथ ही भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया, ओशिनिया और प्रशांत द्वीप देशों तक व्यापार विस्तार का रास्ता भी मजबूत होगा।इस समझौते के तहत भारत से निर्यात होने वाले अधिकांश उत्पादों पर आयात शुल्क समाप्त होने से भारतीय वस्त्र, दवाइयां, इंजीनियरिंग सामान, रत्न एवं आभूषण, मशीनरी, प्रोसेस्ड फूड, चमड़ा और फुटवियर जैसे उत्पाद न्यूजीलैंड में अधिक प्रतिस्पर्धी बन जाएंगे। वहीं न्यूजीलैंड के ऊन, लकड़ी, फलों और अन्य उत्पादों को भी भारतीय बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी।

व्यापार और निवेश में तेजी की उम्मीद
भारत और न्यूजीलैंड के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। दोनों देश अब आईटी, डिजिटल टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर, एग्रीटेक, फूड प्रोसेसिंग, एविएशन और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में भी निवेश बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं।न्यूजीलैंड ने आने वाले वर्षों में भारत में 20 अरब अमेरिकी डॉलर तक निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। वहीं कृषि क्षेत्र में साझेदारी के जरिए आधुनिक तकनीक, उत्पादकता और वैश्विक वैल्यू चेन से जुड़ने के नए अवसर भी खुलेंगे।
रक्षा और इंडो-पैसिफिक सहयोग भी रहेगा केंद्र में
भारत और न्यूजीलैंड के बीच रक्षा सहयोग भी लगातार मजबूत हो रहा है। दोनों देशों के सैनिक प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में साथ लड़ चुके हैं। अब दोनों देश समुद्री सुरक्षा, सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा संवाद और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने के लिए सहयोग बढ़ा रहे हैं।चीन की बढ़ती सक्रियता और बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच यह रणनीतिक साझेदारी दोनों देशों के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

भारतीय समुदाय बना सबसे मजबूत कड़ी
भारत और न्यूजीलैंड के रिश्तों की सबसे बड़ी ताकत वहां रहने वाला भारतीय समुदाय है। न्यूजीलैंड में करीब तीन लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जबकि हजारों भारतीय छात्र वहां उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।भारतीय समुदाय व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी अपने दौरे के दौरान भारतीय समुदाय को भी संबोधित करेंगे, जिससे दोनों देशों के लोगों के बीच संबंध और मजबूत होने की उम्मीद है।
क्या संदेश देगा यह दौरा?
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया को यह संदेश भी देता है कि भारत अब वैश्विक कूटनीति और आर्थिक साझेदारी में पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती सक्रियता, मजबूत अर्थव्यवस्था और विश्वसनीय साझेदार की छवि न्यूजीलैंड जैसे देशों को भारत के साथ दीर्घकालिक सहयोग के लिए प्रेरित कर रही है।करीब 40 साल बाद हो रही यह यात्रा भारत और न्यूजीलैंड के रिश्तों में एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है। यदि व्यापार, निवेश, रक्षा, शिक्षा और तकनीक से जुड़े प्रस्ताव तय समय पर लागू होते हैं, तो आने वाले वर्षों में दोनों देशों के संबंध केवल मजबूत ही नहीं होंगे, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नई आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी का भी आधार बनेंगे।
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