साहब, वेंटिलेटर खाली नहीं है! पांच सरकारी अस्पतालों ने दुत्कारा, रास्ते में ही थम गईं मासूम की सांसें

Editorial
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हमीरपुर यह सिर्फ एक नवजात मासूम की मौत नहीं है, बल्कि देश की बदहाल और संवेदनहीन स्वास्थ्य व्यवस्था के हाथों हुआ एक ऐसा संस्थागत कत्ल है, जो पूरी इंसानियत को शर्मसार कर देता है। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के एक लाचार किसान की नवजात पोती ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया। कानपुर से लेकर देश के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्रों वाले शहर लखनऊ तक, पांच बड़े सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद भी उस मासूम को एक अदद वेंटिलेटर और इलाज नसीब नहीं हुआ। ‘साहब, वेंटिलेटर खाली नहीं है’, ‘संक्रमण फैल जाएगा’, ‘छह महीने बाद आना’… जैसे खोखले बहानों और डॉक्टरों की बेरुखी ने आखिरकार एक बेगुनाह जिंदगी की सांसें हमेशा के लिए छीन लीं। हमीरपुर के नारायणनगर निवासी पीड़ित किसान इंद्रबाबू जब कानपुर के चकेरी स्थित जेके चौराहे के फ्लाईओवर के नीचे अपनी मृतप्राय पोती को सीने से चिपकाए बदहवास बैठे थे, तो उनका रोना और सिस्टम को कोसना किसी भी संवेदनशील इंसान के कलेजे को चीरने के लिए काफी था। इस दर्दनाक और रूह कंपा देने वाले घटनाक्रम की शुरुआत 28 मई की सुबह हुई, जब इंद्रबाबू के घर में एक नन्हीं परी ने जन्म लिया। खुशियों का माहौल अभी शुरू ही हुआ था कि अचानक मासूम की सांसें उखड़ने लगीं। घबराए परिजन उसे तुरंत जिला अस्पताल लेकर भागे और वहां भर्ती कराया। लेकिन सरकारी अस्पतालों की जो पारंपरिक कहानी है, वही यहाँ भी दोहराई गई। आरोप है कि 29 और 30 मई तक ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर इलाज करने के बजाय लगातार टालमटोल करते रहे और वक्त जाया करते रहे। जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो डॉक्टरों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए कह दिया कि बच्ची की खाने की नली में गंभीर समस्या है, जिसका इलाज उनके यहाँ मुमकिन नहीं है। इसके बाद बच्ची को आनन-फानन में कानपुर के हैलट अस्पताल रेफर कर दिया गया।

बच्ची के पिता मनोज और चाचा शुभम उसे लेकर हैलट अस्पताल पहुंचे, तो उन्हें उम्मीद थी कि शायद अब उनकी लाडली की जान बच जाएगी। लेकिन हैलट के डॉक्टरों की संवेदनहीनता ने उनके सारे अरमानों पर पानी फेर दिया। डॉक्टरों ने इलाज शुरू करने के बजाय अजीबोगरीब और बेतुका तर्क देते हुए बच्ची को तुरंत वहाँ से हटाने का फरमान सुना दिया। डॉक्टरों की दलील थी कि इस नवजात बच्ची की वजह से अस्पताल के दूसरे बच्चों में संक्रमण फैल जाएगा। यह सुनकर बदहवास पिता और दादा के पैरों तले जमीन खिसक गई। एंबुलेंस का भारी-भरकम किराया चुकाने और अपनी बची-खुची जिंदगी भर की पूंजी समेटकर वे उम्मीद की आखिरी किरण लेकर राजधानी लखनऊ के लिए भागे। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) पहुंचने पर परिजनों ने सबसे पहले पर्चा बनवाया और जब बच्ची को भर्ती कराने पहुंचे, तो सिस्टम ने अपना क्रूर चेहरा फिर दिखाया। वहां से दो टूक जवाब मिला, “यहाँ वेंटिलेटर खाली नहीं है, इसे वापस ले जाओ।” वहां से निराश होकर वे राम मनोहर लोहिया अस्पताल दौड़े। वहां भी मासूम की नाजुक हालत देखने के बाद डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि हमारे पास इस बीमारी का कोई विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है, इसे तुरंत एसजीपीजीआई (SG PGI) ले जाओ। जब थके-हारे, भूखे-प्यासे परिजन भारी उम्मीदों के साथ देश के प्रतिष्ठित संस्थान पीजीआई पहुंचे, तो वहां के डॉक्टरों ने जो कहा, उसने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। डॉक्टरों ने कहा, “यहाँ इस तरह के ऑपरेशन की तत्काल कोई व्यवस्था नहीं है, इसे छह महीने बाद लेकर आना।”

यह कोई मजाक नहीं बल्कि एक तड़पती हुई नवजात बच्ची के परिजनों के साथ व्यवस्था का भद्दा मजाक था। जिस बच्ची की सांसें चंद घंटों की मोहलत पर टिकी थीं, उसे छह महीने बाद आने की सलाह दी जा रही थी। चारों तरफ से दुत्कारे जाने और पूरी तरह निराश होने के बाद, थक-हारकर परिजन वापस अपने गांव हमीरपुर के लिए रवाना हो गए। लेकिन रास्ते में कानपुर के जेके चौराहे पर आकर उनकी हिम्मत ने जवाब दे दिया। बदहवास दादा अपनी दम तोड़ती पोती को सीने से लगाए फ्लाईओवर के नीचे जमीन पर ही बैठ गए और रोने लगे। आखिरकार, सोमवार को जब वे उसे लेकर हमीरपुर पहुंचे, तो उस मासूम ने दम तोड़ दिया। वह सिस्टम की इस अंतहीन दौड़ को बर्दाश्त नहीं कर पाई। इस पूरे मामले पर अब हमेशा की तरह कागजी खानापूर्ति और लीपापोती का दौर शुरू हो चुका है। बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. शैलेंद्र गौतम का कहना है कि उन्हें इस मामले की जानकारी मिली है और वे जांच कर रहे हैं कि बच्ची अस्पताल में कब आई थी। उन्होंने दावा किया कि उनके यहाँ पीडियाट्रिक सर्जन मौजूद हैं और बच्चों की ऐसी सर्जरी की जाती है। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर सारी सुविधाएं और डॉक्टर मौजूद थे, तो एक गरीब किसान को पांच अस्पतालों के दरवाजे से दुत्कार कर क्यों भगा दिया गया? क्यों एक लाचार परिवार को अपनी जेब खाली करने के बाद भी सिर्फ लाश लेकर घर लौटना पड़ा? यह घटना चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है कि हमारे बड़े-बड़े दावों वाले सुपर स्पेशलिटी अस्पताल गरीबों के लिए आज भी सफेद हाथी साबित हो रहे हैं, जहाँ वेंटिलेटर और डॉक्टरों की कमी का बहाना बनाकर मासूमों को मौत के मुंह में धकेल दिया जाता है।

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