दूसरे धर्म में शादी पर पारसी महिलाओं से भेदभाव? सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला, 9 जजों की संविधान पीठ के फैसले पर टिकी नजर

Editorial
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दूसरे धर्म में शादी करने के बाद क्या कोई महिला अपनी धार्मिक पहचान और पूजा-अर्चना का अधिकार खो सकती है? यह सवाल अब देश की सर्वोच्च अदालत के सामने एक बड़े संवैधानिक मुद्दे के रूप में खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा एक मामला न सिर्फ पारसी समुदाय की परंपराओं पर बहस छेड़ रहा है, बल्कि महिलाओं के समान अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक भेदभाव जैसे अहम सवालों को भी केंद्र में ला रहा है। मामला पारसी महिला दीना बुधराजा से जुड़ा है, जिन्होंने एक हिंदू युवक से विवाह किया, लेकिन अपना धर्म नहीं बदला। इसके बावजूद उन्हें नागपुर स्थित पारसी अगियारी (अग्नि मंदिर) में प्रवेश करने से रोक दिया गया। यह घटना तब सामने आई जब वर्ष 2024 में अपनी दादी के अंतिम संस्कार के दौरान वह धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने पहुंचीं। मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के बाद उन्होंने इसे अपने संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यह केवल एक व्यक्ति का विवाद नहीं, बल्कि महिलाओं के धार्मिक अधिकारों और समानता से जुड़ा व्यापक संवैधानिक प्रश्न है। अदालत ने फिलहाल अंतिम फैसला देने से इनकार करते हुए कहा कि वह इस मुद्दे पर नौ जजों की संविधान पीठ के निर्णय का इंतजार करेगी, जो धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों पर विचार कर रही है। याचिका में नागपुर पारसी पंचायत के संविधान के नियम 5(2) को चुनौती दी गई है। दीना बुधराजा का आरोप है कि यह नियम पारसी महिलाओं के साथ भेदभाव करता है। नियम के अनुसार यदि कोई पारसी महिला दूसरे धर्म के व्यक्ति से विवाह करती है तो उसे समुदाय की धार्मिक पहचान और अगियारी में प्रवेश का अधिकार खोना पड़ता है। वहीं यदि कोई पारसी पुरुष दूसरे धर्म की महिला से विवाह करता है तो उसके धार्मिक अधिकार प्रभावित नहीं होते। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह व्यवस्था महिलाओं और पुरुषों के बीच स्पष्ट असमानता पैदा करती है।महिला ने अपनी याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 25 का हवाला दिया है। उनका तर्क है कि कानून के समक्ष समानता, सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता किसी भी नागरिक के मूल अधिकार हैं। केवल विवाह के आधार पर किसी महिला की धार्मिक पहचान समाप्त नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, नागपुर पारसी पंचायत और चैरिटी कमिश्नर को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत के समक्ष यह भी मांग रखी गई है कि मामले के अंतिम निपटारे तक दीना बुधराजा को नागपुर अगियारी में प्रवेश और अपने परिवार के धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने की अनुमति दी जाए। यह मामला अब केवल एक पारसी महिला के अधिकारों तक सीमित नहीं रह गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला देश में धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन तय करने वाला एक ऐतिहासिक निर्णय साबित हो सकता है। यही वजह है कि पूरे देश की नजर अब नौ जजों की संविधान पीठ के फैसले पर टिकी हुई है।

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