गुरु पूर्णिमा पर टीएमयू में भारतीय ज्ञान परंपरा का भव्य उत्सव: महर्षि वेदव्यास को श्रद्धांजलि, गुरु-शिष्य परंपरा और राष्ट्र निर्माण का दिया प्रेरक संदेश

Editorial
7 Min Read

रिपोर्ट :मो अरशद

मुरादाबाद तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय (टीएमयू) में गुरु पूर्णिमा और महर्षि वेदव्यास जयंती श्रद्धा, सम्मान और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप भव्यता के साथ मनाई गई। विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ कम्प्यूटिंग साइंसेज़ एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (CCSIT) एवं फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में गुरु-शिष्य परंपरा, भारतीय ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक तकनीकी शिक्षा के समन्वय पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि बदलते तकनीकी दौर में भी भारतीय संस्कृति और गुरु का मार्गदर्शन समाज और राष्ट्र के विकास की सबसे बड़ी शक्ति है।कार्यक्रम का शुभारंभ फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग के डीन प्रो. राकेश कुमार द्विवेदी ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया। सरस्वती वंदना और गुरु वंदना के साथ शुरू हुए समारोह में महर्षि वेदव्यास के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। उपस्थित सभी शिक्षकों और स्टाफ सदस्यों ने गुरुजनों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

गुरु पूर्णिमा केवल पर्व नहीं, भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रतीक

मुख्य वक्ता प्रो. राकेश कुमार द्विवेदी ने अपने प्रेरणादायी संबोधन में कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता की उस महान परंपरा का प्रतीक है, जिसने सदियों से समाज को ज्ञान, संस्कार और नैतिक मूल्यों की दिशा प्रदान की है।उन्होंने प्रसिद्ध श्लोक “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः…” का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु व्यक्ति के जीवन में केवल ज्ञान का स्रोत नहीं होता, बल्कि वह व्यक्तित्व निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है।प्रो. द्विवेदी ने कहा कि महर्षि वेदव्यास ने वेदों का संकलन, महाभारत की रचना तथा भारतीय ज्ञान-विज्ञान को व्यवस्थित स्वरूप देकर पूरी मानवता को अमूल्य धरोहर प्रदान की। आज भी उनके विचार भारतीय संस्कृति की आधारशिला बने हुए हैं।

AI और क्वांटम कम्प्यूटिंग के युग में बढ़ी शिक्षकों की जिम्मेदारी

अपने संबोधन में प्रो. द्विवेदी ने आधुनिक तकनीकी परिवेश का उल्लेख करते हुए कहा कि आज दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम कम्प्यूटिंग, रोबोटिक्स, मशीन लर्निंग और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में शिक्षकों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।उन्होंने कहा कि इंजीनियरिंग शिक्षा का उद्देश्य केवल तकनीकी जानकारी देना नहीं, बल्कि ऐसे नवाचारी, नैतिक और जिम्मेदार युवा तैयार करना है, जो समाज और राष्ट्र के विकास में सार्थक योगदान दे सकें।उन्होंने जोर देकर कहा कि आने वाले समय में वही विद्यार्थी सफल होंगे जो तकनीकी दक्षता के साथ-साथ नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी को भी अपनाएंगे।

स्वामी विवेकानंद और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के विचारों से मिली प्रेरणा

प्रो. द्विवेदी ने अपने संबोधन में स्वामी विवेकानंद और भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के प्रेरणादायी विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की प्रतिभा, आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का विकास करना है।उन्होंने कहा कि एक शिक्षक का एक प्रेरक शब्द किसी विद्यार्थी के पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है। इसलिए शिक्षकों को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

नवाचार, अनुसंधान और उद्यमिता पर दिया विशेष जोर

प्रो. द्विवेदी ने शिक्षकों से आह्वान किया कि वे विद्यार्थियों को केवल परीक्षा केंद्रित शिक्षा तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें नवाचार (Innovation), अनुसंधान (Research), पेटेंट, स्टार्टअप, उद्यमिता (Entrepreneurship) तथा उद्योग-अकादमिक सहयोग (Industry-Academia Collaboration) की दिशा में भी प्रेरित करें।उन्होंने कहा कि शैक्षणिक ईमानदारी, अनुसंधान की गुणवत्ता और तकनीकी नवाचार ही भारत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिला सकते हैं।उन्होंने विद्यार्थियों से जिज्ञासु बनने, लगातार सीखने, प्रश्न पूछने, असफलताओं से सीख लेने और अपने ज्ञान का उपयोग समाज एवं राष्ट्र निर्माण में करने का आह्वान किया।

गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी धरोहर

कार्यक्रम के दौरान सीसीएसआईटी के फैकल्टी क्लब कोऑर्डिनेटर डॉ. संदीप वर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है, जो गुरु और शिष्य के बीच विश्वास, सम्मान और ज्ञान के रिश्ते को मजबूत करती है।उन्होंने विद्यार्थियों से जीवन में ज्ञान, विनम्रता, अनुशासन, सेवा और नैतिकता को अपनाने का आग्रह किया और कहा कि यही मूल्य किसी भी व्यक्ति को सफल और आदर्श नागरिक बनाते हैं।

भारतीय संस्कृति और आधुनिक शिक्षा का अनूठा संगम

पूरे कार्यक्रम के दौरान भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक तकनीकी शिक्षा का सुंदर समन्वय देखने को मिला। उपस्थित शिक्षकों और कर्मचारियों ने इस बात पर जोर दिया कि नई तकनीक को अपनाते हुए भी भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि यदि तकनीकी ज्ञान के साथ नैतिक शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी का समावेश किया जाए तो देश को उत्कृष्ट वैज्ञानिक, इंजीनियर, शोधकर्ता और जिम्मेदार नागरिक मिल सकते हैं।

गुरुजनों के सम्मान के साथ कार्यक्रम का हुआ समापन

कार्यक्रम के अंत में सभी शिक्षकों एवं स्टाफ सदस्यों ने गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और शिक्षा के माध्यम से समाज, मानवता एवं राष्ट्र निर्माण में उत्कृष्ट योगदान देने का संकल्प लिया।कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. शालिनी निनोरिया, एसोसिएट प्रोफेसर, सीसीएसआईटी ने किया। उन्होंने अंत में सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि गुरु पूर्णिमा जैसे आयोजन नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और नैतिक मूल्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

ज्ञान, संस्कार और तकनीक का संदेश

टीएमयू में आयोजित गुरु पूर्णिमा एवं महर्षि वेदव्यास जयंती का यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, गुरु-शिष्य संबंधों और आधुनिक शिक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रेरणादायी प्रयास भी रहा। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि तकनीकी प्रगति तभी सार्थक है, जब उसके साथ संस्कार, नैतिकता और मानवता के मूल्य भी जुड़े हों। यही सोच विकसित भारत के निर्माण और ज्ञान-आधारित समाज की स्थापना की मजबूत नींव बन सकती है।

read on:https://news7hindi.com/campaign-to-stop-road-accidents-siddharthnagar-police-reached-school-taught-traffic-rules-to-children-and-gave-mantra-of-safe-travel/

or advertisement visit our office:http://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

Share This Article
Leave a Comment