
संभल में 46 साल पुराने जख्मों पर आखिरकार मरहम लगना शुरू हो गया है। वर्ष 1978 के भीषण सांप्रदायिक दंगों में अपना सबकुछ गंवाने वाले एक परिवार को अब न्याय और सम्मान की नई पहचान मिली है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर दंगा पीड़ित परिवार को आवासीय भूमि का पट्टा सौंपा गया है। जिस परिवार ने दंगों की आग में अपने मुखिया को खोया, न्याय की उम्मीद में वर्षों तक भटकता रहा और अंततः पलायन के लिए मजबूर हो गया, उसके लिए यह पल किसी नई जिंदगी से कम नहीं है। संभल का 1978 का दंगा आज भी जिले के इतिहास के सबसे भयावह अध्यायों में गिना जाता है। 29 मार्च 1978 को एक अफवाह ने पूरे शहर को हिंसा की आग में झोंक दिया था। देखते ही देखते बाजारों में आगजनी, लूटपाट, पथराव और हिंसा का तांडव शुरू हो गया। हालात इतने बिगड़ गए थे कि शहर में दो महीने तक कर्फ्यू लगा रहा। इस हिंसा में कई लोगों की जान चली गई और 169 मुकदमे दर्ज किए गए। दंगों की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए और उन्हें अपना घर-बार छोड़कर दूसरे शहरों में बसना पड़ा। इन्हीं पीड़ित परिवारों में रामशरण रस्तोगी का परिवार भी शामिल था। दंगों के दौरान रामशरण रस्तोगी की हत्या कर दी गई थी। उनके बेटे सुभाष चंद्र रस्तोगी ने उस समय मुकदमा दर्ज कराया, लेकिन परिवार को कभी न्याय नहीं मिला। हालात ऐसे बने कि परिवार को संभल छोड़कर पलायन करना पड़ा। वर्षों तक यह परिवार अपने दर्द और संघर्ष के साथ जीता रहा, लेकिन उनकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था। साल 2024 में जामा मस्जिद सर्वे के दौरान हुए बवाल के बाद जब 1978 के दंगों की चर्चा फिर शुरू हुई, तब कई पीड़ित परिवार सामने आए। इन्हीं में रामशरण रस्तोगी का परिवार भी था। परिवार के सदस्य कपिल रस्तोगी ने अपनी माता रुक्मन रस्तोगी के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर अपनी पीड़ा साझा की। मुख्यमंत्री ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पीड़ित परिवार को राहत और पुनर्वास का भरोसा दिया था।

अब उसी आश्वासन को धरातल पर उतारते हुए प्रशासन ने रुक्मन रस्तोगी को 100 वर्गमीटर आवासीय भूमि का पट्टा आवंटित किया है। जिले के प्रभारी मंत्री जेपीएस राठौर ने स्वयं पट्टे के अभिलेख सौंपे और भूमि पूजन कर निर्माण कार्य की नींव भी रखी। इस दौरान प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी ने इस क्षण को और अधिक ऐतिहासिक बना दिया। इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिस भूमि को परिवार को आवंटित किया गया है, उस पर वर्षों से अवैध कब्जा था। प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए कब्जा हटाया और भूमि को मुक्त कराया। जिलाधिकारी ने इसे पुनर्वास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताते हुए कहा कि दंगा पीड़ित परिवारों को उनका अधिकार दिलाने के लिए प्रशासन पूरी गंभीरता से कार्य कर रहा है।
1978 के दंगों की एक और बड़ी पहचान खग्गू सराय स्थित वह प्राचीन शिव मंदिर था, जो दंगों के बाद बंद हो गया था। करीब 46 वर्षों तक मंदिर के कपाट बंद रहे और वहां घंटियों की आवाज नहीं गूंजी। वर्ष 2024 में प्रशासन ने मंदिर का ताला खुलवाया तो दशकों बाद फिर से वहां पूजा-अर्चना शुरू हुई। यह घटना भी उन लोगों के लिए भावनात्मक पल थी, जो वर्षों से उस मंदिर को फिर से खुला देखने की प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रभारी मंत्री जेपीएस राठौर ने इस पहल को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि वर्षों तक अन्याय और उपेक्षा झेलने वाले परिवारों को अब सम्मान और सुरक्षा का अधिकार मिल रहा है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश आज दंगामुक्त वातावरण की ओर बढ़ रहा है और कानून का राज स्थापित हुआ है। शासन की प्राथमिकता है कि हर पीड़ित परिवार को न्याय मिले और उसके जीवन में स्थायित्व आए। 46 वर्षों तक न्याय और पुनर्वास की राह देखता रहा यह परिवार आज नई उम्मीदों के साथ अपने भविष्य की नींव रख रहा है। यह केवल एक भूमि का पट्टा नहीं, बल्कि उस दर्द, संघर्ष और इंतजार की मान्यता है जिसे एक परिवार ने पीढ़ियों तक झेला। संभल में शुरू हुई यह पहल अब उन तमाम परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बन गई है, जो वर्षों से न्याय और सम्मान की आस लगाए बैठे हैं।
or advertisement visit our office:http://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

