नई दिल्ली चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर देश में चल रही राजनीतिक बहस के बीच दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का मामला भी चर्चा में है। प्रदर्शन में शामिल AISA अध्यक्ष नेहा बोरा ने पुलिस की अनुमति को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर चुनाव से जुड़े फैसलों पर जनता से सहमति नहीं ली जाती, तो अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत प्रदर्शन करने के लिए अनुमति क्यों मांगी जाए।नेहा बोरा का यह बयान ऐसे समय में आया है जब 25 सितंबर को दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारियों की ओर से चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठाई गई। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर की ओर बढ़ने से रोका और कई लोगों को हिरासत में लिया। रिपोर्टों के मुताबिक नेहा बोरा भी हिरासत में लिए गए लोगों में शामिल थीं।
‘वोट चोरी करने से पहले जनता से पूछा था?’
प्रदर्शन के दौरान नेहा बोरा ने चुनाव आयोग और प्रदर्शन की अनुमति के मुद्दे को एक साथ जोड़ते हुए सवाल उठाया। उनके बयान का आशय था कि यदि चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों के लिए आम जनता से अनुमति नहीं ली जाती, तो नागरिकों को अपने सवाल और असहमति सामने रखने के लिए प्रदर्शन की अनुमति लेने की जरूरत क्यों होनी चाहिए।यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब विपक्षी दलों और कुछ नागरिक समूहों की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए अलग-अलग राय और टिप्पणियों को सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोका
25 सितंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन का आयोजन किया गया। इसमें नेहा बोरा, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण समेत कई सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक समूहों से जुड़े लोग शामिल हुए। रिपोर्टों के अनुसार प्रदर्शनकारियों की मांगों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर जवाबदेही शामिल थी।दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के अनुसार संबंधित स्थानों पर प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं ली गई थी या अनुमति प्रदान नहीं की गई थी। पुलिस ने इसके बाद प्रदर्शनकारियों को रोकने की कार्रवाई की। रिपोर्टों के मुताबिक जंतर-मंतर से करीब 50-60 लोगों को हिरासत में लिया गया, जबकि अन्य स्थानों पर भी प्रदर्शनकारियों को रोके जाने की जानकारी सामने आई।नेहा बोरा ने पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शन की अनुमति के सवाल को लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराई। इस पूरे घटनाक्रम ने प्रदर्शन की अनुमति और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर बहस को फिर चर्चा में ला दिया है।
चुनाव आयोग पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर हाल के दिनों में चर्चा का एक बड़ा कारण आयोग के भीतर दर्ज की गई कुछ आपत्तियां भी हैं। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार विभिन्न मुद्दों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं।रिपोर्टों के अनुसार इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और SIR से संबंधित प्रक्रियाएं शामिल थीं। इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस तेज हुई।हालांकि इन रिपोर्टों के बाद चुनाव आयोग ने अलग राय या सुझावों को संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। आयोग के मुताबिक बहुसदस्यीय संस्था में सदस्यों के बीच टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव सामान्य बात हैं तथा अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इसलिए आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों को अंतिम फैसलों से अलग संदर्भ में देखने की जरूरत है।
‘वोट चोरी’ के आरोपों पर भी जारी है विवाद
चुनाव आयोग को लेकर मौजूदा विवाद में ‘वोट चोरी’ शब्द राजनीतिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा बन गया है। विपक्षी नेताओं की ओर से चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता और चुनावी प्रक्रिया को निर्धारित कानूनी एवं संस्थागत व्यवस्था के तहत संचालित किए जाने की बात कहता रहा है।इसलिए ‘वोट चोरी’ को यहां एक राजनीतिक आरोप के रूप में देखना जरूरी है, न कि स्थापित तथ्य के रूप में। आरोपों और उनके जवाब के बीच वास्तविक स्थिति का निर्धारण दस्तावेजों, मतदाता सूची के रिकॉर्ड और संबंधित चुनावी प्रक्रियाओं की जांच से ही किया जा सकता है।
प्रदर्शन और लोकतांत्रिक अधिकार पर बहस
नेहा बोरा के बयान ने एक व्यापक सवाल खड़ा किया है—क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए प्रशासनिक अनुमति जरूरी होनी चाहिए और अगर अनुमति नहीं मिलती तो नागरिक अपनी असहमति किस तरह दर्ज कराएं?दूसरी तरफ प्रशासन के सामने सार्वजनिक व्यवस्था, यातायात, सुरक्षा और निर्धारित प्रदर्शन स्थलों के प्रबंधन की जिम्मेदारी भी रहती है। ऐसे में प्रदर्शन की अनुमति का मुद्दा केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन से जुड़ा विषय भी है।25 सितंबर के घटनाक्रम में पुलिस ने अनुमति नहीं होने का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को रोका, जबकि प्रदर्शनकारियों ने इसे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग में बाधा के रूप में देखा। दोनों पक्षों के इन दावों के बीच अब यह मामला राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया है।
आगे क्या होगा?
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR, मतदाता सूची और प्रदर्शन की अनुमति को लेकर विवाद फिलहाल जारी है। एक तरफ विपक्षी दल और नागरिक संगठन चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं, वहीं चुनाव आयोग अपने निर्णयों को संवैधानिक और संस्थागत प्रक्रिया के तहत लिए जाने की बात कह रहा है।नेहा बोरा का बयान इसी व्यापक विवाद के बीच सामने आया है। उनका सवाल प्रदर्शन की अनुमति से आगे बढ़कर चुनावी प्रक्रिया में जनता की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही पर केंद्रित है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों, नागरिक संगठनों और चुनाव आयोग के बीच बहस और तेज होने की संभावना है।फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘वोट चोरी’ से जुड़े आरोप राजनीतिक दावे हैं, जबकि चुनाव आयोग ने इन्हें स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया से जुड़े किसी भी निष्कर्ष के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड और प्रमाणित तथ्यों को आधार बनाना महत्वपूर्ण रहेगा।
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