जंगलों की आग के खिलाफ उत्तराखंड सरकार का ‘नवाचार’: अब सीधे पेयजल लाइनों से हाई-प्रेशर पानी का छिड़काव करेंगे वनकर्मी, आंकड़ों के साथ नई रणनीति तैयार

Editorial
4 Min Read

देहरादून उत्तराखंड में जंगलों को भीषण आग से बचाने के लिए सरकार और वन विभाग अब आधुनिक नवाचारों और नई रणनीतियों पर विशेष जोर दे रहे हैं। इस नई योजना के तहत शहरी क्षेत्रों की तर्ज पर अब जंगलों के बीच से गुजरने वाली पेयजल लाइनों में हाइड्रेंट लगाए जाएंगे। हाइड्रेंट एक ऐसा सक्रिय संपर्क बिंदु या वाल्व होता है जिसके माध्यम से दमकलकर्मी और वनकर्मी सीधे उच्च दबाव वाला पानी प्राप्त कर सकते हैं। जंगलों में इनके लगने से आग लगने की स्थिति में वनकर्मी पाइप जोड़कर सीधे पानी का छिड़काव कर सकेंगे, जिससे पानी के संकट के कारण बेकाबू होने वाली आग पर तुरंत काबू पाया जा सकेगा। वन मंत्री सुबोध उनियाल ने मुख्य वन संरक्षक वनाग्नि एवं आपदा प्रबंधन को इस संबंध में विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश जारी कर दिए हैं। वर्तमान में जल संस्थान और पेयजल निगम से जंगलों से गुजरने वाली पेयजल योजनाओं की जानकारी जुटाई जा रही है, जिसके बाद इसे अंतिम रूप दिया जाएगा।

 

पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील इस पर्वतीय राज्य में हर साल दावानल (जंगलों की आग) के कारण बड़े पैमाने पर वन संपदा जलकर खाक हो जाती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष 15 फरवरी से अब तक राज्य के जंगलों में आग लगने की कुल 394 घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें 331.12 हेक्टेयर वन क्षेत्र पूरी तरह झुलस चुका है। क्षेत्रीय आधार पर देखें तो गढ़वाल मंडल में आग का प्रकोप सबसे अधिक रहा है, जहां 285 घटनाओं में 241.32 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। वहीं कुमाऊं मंडल में आग की 74 घटनाओं के कारण 64.05 हेक्टेयर जंगल को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा, वन्यजीव परिरक्षण क्षेत्रों (वाइल्डलाइफ सेंचुरीज) में भी आग ने तांडव मचाया है, जहां 35 घटनाओं में 25.75 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ है। राज्य के छह जिले—अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल, पौड़ी, टिहरी और उत्तरकाशी आग के लिहाज से सबसे ज्यादा अति संवेदनशील माने गए हैं।

आग को फैलने से रोकने के लिए पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होने वाली फायर लाइनों को लेकर भी एक बड़ा बदलाव किया जा रहा है। वर्तमान में उत्तराखंड के जंगलों में कुल 13,085.03 किलोमीटर लंबी फायर लाइनें मौजूद हैं, जो असल में चौड़े साफ रास्ते होते हैं ताकि आग एक हिस्से से दूसरे हिस्से में न जा सके। हालांकि, 1000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रखरखाव के अभाव में कई जगह इन पर पेड़ उग आए हैं। यद्यपि इन पेड़ों के कटान की अनुमति मिल चुकी है, लेकिन वन विभाग अब इसके साथ-साथ एक नया विकल्प भी अपना रहा है। नई रणनीति के तहत जिन जंगलों से होकर पक्की या कच्ची सड़कें गुजर रही हैं, उन सड़कों के दोनों किनारों का उपयोग करते हुए नई फायर लाइनें विकसित की जाएंगी। इससे जंगलों के भीतर नए रास्ते बनाने की जरूरत नहीं होगी और सड़कों के किनारे की सफाई रखकर आग को बढ़ने से आसानी से रोका जा सकेगा। यह अनूठी पहल उत्तराखंड की बहुमूल्य वन संपदा और वन्यजीवों को सुरक्षित रखने में एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकती है।

read more:https://news7hindi.com/honor-killing-or-greed-for-property-in-meerut-a-young-father-along-with-his-step-mother-killed-his-daughter-and-performed-the-last-rites-secretly-early-in-the-morning/

for advertisement visit our office:http://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

Share This Article
Leave a Comment