
लखनऊ उत्तर प्रदेश की सियासत में राम मंदिर चंदा विवाद ने नया राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के बयान के बाद अब योगी सरकार के मंत्री और दोनों डिप्टी सीएम पूरी तरह आक्रामक हो गए हैं। सरकार के कई बड़े चेहरों ने एक के बाद एक बयान देकर न सिर्फ अखिलेश यादव को घेरा है, बल्कि बाबरी मस्जिद के लिए जुटाए गए चंदे का हिसाब मांगते हुए सियासी बहस को नया मोड़ दे दिया है। आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर ने प्रदेश की राजनीति को गर्मा दिया है और आने वाले विधानसभा चुनावों की आहट भी साफ सुनाई देने लगी है। राम मंदिर में दान की राशि को लेकर सवाल उठाने वाले अखिलेश यादव अब भाजपा नेताओं के सीधे निशाने पर हैं। उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने सबसे तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जो लोग आज राम मंदिर के चंदे पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें पहले बाबरी मस्जिद के लिए जुटाए गए चंदे का हिसाब देना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्षों तक बाबरी मस्जिद के नाम पर चंदा जुटाया गया, लेकिन उसका क्या हुआ, यह देश की जनता जानना चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष जानबूझकर राम मंदिर जैसे आस्था के विषय पर भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है।

बृजेश पाठक ने कहा कि राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है और उसके निर्माण तथा संचालन की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है। ऐसे में बिना तथ्यों के आरोप लगाना केवल राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश है। उन्होंने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्ष के पास जनता के सामने रखने के लिए कोई सकारात्मक एजेंडा नहीं बचा है, इसलिए वह धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों को लेकर भ्रम की राजनीति कर रहा है। उधर मुरादाबाद पहुंचे उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी अखिलेश यादव पर जमकर हमला बोला। उन्होंने दावा किया कि आने वाले समय में समाजवादी पार्टी का वही हाल होगा, जो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का हो रहा है। उन्होंने कहा कि 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा ऐतिहासिक जीत के साथ जीतेगी और यह चुनाव अखिलेश यादव के राजनीतिक भविष्य के लिए निर्णायक साबित होगा। केशव मौर्य ने कहा कि समाजवादी पार्टी की कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा की राजनीति परिवारवाद, जातिवाद और तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूमती है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता अब इन बातों को अच्छी तरह समझ चुकी है और भाजपा के विकास मॉडल पर भरोसा कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि यूपी में भाजपा की सरकार फिर बनेगी और विपक्ष सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रह जाएगा। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन भाषा की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। जो लोग मर्यादा का उल्लंघन करेंगे, कानून उनके खिलाफ कार्रवाई करेगा। उन्होंने साफ कहा कि भाजपा किसी भी तरह की अभद्र राजनीति या व्यक्तिगत टिप्पणी का समर्थन नहीं करती।वहीं पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने भी अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश सरकार पंचायत चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार थी, लेकिन समाजवादी पार्टी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कराकर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। उन्होंने कहा कि अब सरकार अदालत के फैसले का इंतजार कर रही है, लेकिन विपक्ष इस मुद्दे पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आ रहा।
राजभर ने समाजवादी पार्टी के शासनकाल की कानून-व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सपा सरकार के दौरान प्रदेश में सैकड़ों दंगे हुए, जबकि भाजपा सरकार के नौ वर्षों में कहीं भी बड़े दंगे की स्थिति नहीं बनी। उन्होंने दावा किया कि भाजपा सरकार ने कानून व्यवस्था को मजबूत किया है और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है।सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्री भूपेंद्र चौधरी ने भी सपा अध्यक्ष पर हमला बोलते हुए कहा कि उनके शासनकाल में छोटे व्यापारियों, रेहड़ी-पटरी वालों और बुनकरों का उत्पीड़न होता था। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा के कार्यकाल में गुंडे और माफिया खुलेआम वसूली करते थे, जबकि आज उत्तर प्रदेश निवेशकों की पहली पसंद बन चुका है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने उद्योगों को बढ़ावा देकर लाखों लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया है और प्रदेश को विकास की नई दिशा दी है।राम मंदिर चंदा विवाद अब केवल दान और हिसाब-किताब तक सीमित नहीं रह गया है। यह मुद्दा सीधे तौर पर भाजपा और सपा के बीच वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बनता जा रहा है। एक तरफ विपक्ष सरकार पर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी तरफ भाजपा नेता बाबरी मस्जिद के चंदे से लेकर सपा के पुराने शासनकाल तक के मुद्दे उठाकर जवाबी हमला कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और ज्यादा गर्मा सकता है। क्योंकि राम मंदिर सिर्फ एक धार्मिक विषय नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे भावनात्मक और प्रभावशाली मुद्दा भी है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आरोपों और पलटवारों के इस दौर में जनता किसके तर्कों पर भरोसा करती है और आने वाले चुनावों में इसका राजनीतिक असर कितना बड़ा साबित होता है।
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