जीवन में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिन्हें किसी परिचय की जरूरत नहीं होती। वक्त गुजर जाता है, पीढ़ियां बदल जाती हैं, लेकिन उन नामों की गूंज इतिहास में बनी रहती है।
- पंजाब की धरती पर जन्मा था वह नौजवान
- जलियांवाला बाग की घटना और बदलता हुआ दौर
- पढ़ाई के साथ बढ़ता गया राजनीतिक चिंतन
- नेशनल कॉलेज और स्वतंत्रता आंदोलन
- क्रांतिकारी संगठन और नई विचारधारा
- लाला लाजपत राय की मौत के बाद बदला घटनाक्रम
- केंद्रीय विधानसभा में बम और गिरफ्तारी
- जेल में भी जारी रहा पढ़ने और लिखने का सिलसिला
- लाहौर षड्यंत्र केस
- 23 मार्च 1931—वह दिन जब देश ने तीन क्रांतिकारी खो दिए
- भगत सिंह की विरासत सिर्फ एक तस्वीर नहीं
- आज भी क्यों याद किए जाते हैं भगत सिंह?
एक ऐसा ही नाम है—भगत सिंह।
माटी ने जिस लाल को जन्म दिया,
वो हिंदुस्तान का अभिमान था,
जिसकी रग-रग में आजादी थी,
वो वीर भगत सिंह महान था।
आज की इस खास कहानी में हम जानेंगे उस नौजवान की पूरी यात्रा, जिसने बचपन में देश की गुलामी को महसूस किया, युवावस्था में क्रांतिकारी विचारों को अपनाया, जेल में रहते हुए लगातार पढ़ा-लिखा और महज 23 वर्ष की उम्र में फांसी के फंदे तक पहुंचकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अमिट स्थान बना लिया।
पंजाब की धरती पर जन्मा था वह नौजवान
भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के अनुसार, भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को तत्कालीन लायलपुर जिले के बंगा गांव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान के फैसलाबाद क्षेत्र में है। उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। उनका परिवार पहले खटकर कलां से बंगा आया था। भगत सिंह ने शुरुआती शिक्षा बंगा के प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त की।भगत सिंह का बचपन सामान्य माहौल में नहीं बीता था। उनके परिवार में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े विचार पहले से मौजूद थे। उनके चाचा अजीत सिंह भी ब्रिटिश शासन के विरोधी आंदोलन से जुड़े रहे थे।इसलिए बचपन से ही देश की राजनीतिक परिस्थितियों और अंग्रेजी शासन की नीतियों को समझने का अवसर उन्हें मिला।
जलियांवाला बाग की घटना और बदलता हुआ दौर
फिर आया 13 अप्रैल 1919।अमृतसर का जलियांवाला बाग। बैसाखी के दिन वहां बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे। ब्रिटिश शासन के दौरान हुई इस गोलीबारी ने पूरे देश को झकझोर दिया।उस समय भगत सिंह लगभग 12 वर्ष के थे।जलियांवाला बाग की घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और दर्दनाक घटनाओं में गिनी जाती है। इस घटना ने पूरे पंजाब सहित देश के राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया।भगत सिंह के जीवन और विचारों के संदर्भ में भी जलियांवाला बाग का प्रसंग अक्सर महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि किसी व्यक्ति के मन पर घटना का प्रभाव किस तरह पड़ा, इसे बताते समय ऐतिहासिक स्रोतों और बाद के विवरणों में अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।शासन की कठोरता देख रहा था और दूसरी तरफ पंजाब की युवा पीढ़ी के भीतर आजादी की इच्छा लगातार मजबूत हो रही थी। इसी दौर में भगत सिंह का व्यक्तित्व भी आकार ले रहा था।”

पढ़ाई के साथ बढ़ता गया राजनीतिक चिंतन
भगत सिंह सिर्फ क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े युवा नहीं थे, बल्कि वे गंभीर पाठक और लेखक भी थे।भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के अनुसार, उन्होंने साहित्य, इतिहास, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र जैसे विषयों का अध्ययन किया। जेल के दौरान भी उनकी किताबों के प्रति रुचि बनी रही। उनके पत्रों से पता चलता है कि वे जेल में भी किताबें और पढ़ने की सामग्री मंगाने की कोशिश करते थे।युवा भगत सिंह पत्रकारिता से भी जुड़े। उन्होंने कानपुर के राष्ट्रवादी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ काम किया और ‘प्रताप’ जैसे प्रकाशनों के लिए लिखा। बाद में ‘कीर्ति’ जैसी पत्रिका से भी उनका जुड़ाव रहा।यानी उनके व्यक्तित्व में एक तरफ क्रांतिकारी सक्रियता थी तो दूसरी तरफ अध्ययन, लेखन और विचारों की गहराई भी थी।

नेशनल कॉलेज और स्वतंत्रता आंदोलन
लाहौर का नेशनल कॉलेज भगत सिंह के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक था। कॉलेज का वातावरण राष्ट्रीय आंदोलन और राजनीतिक विचारों से प्रभावित था।यहीं भगत सिंह के संपर्क कई ऐसे युवाओं से हुए, जिनके साथ उन्होंने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।उनके विचार धीरे-धीरे सिर्फ अंग्रेजी शासन से मुक्ति तक सीमित नहीं रहे। वे समाज, मजदूरों, किसानों, समानता और आर्थिक व्यवस्था जैसे सवालों पर भी विचार करने लगे।

क्रांतिकारी संगठन और नई विचारधारा
भगत सिंह का जुड़ाव क्रांतिकारी संगठनों से बढ़ा। बाद के वर्षों में वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े। 1928 में संगठन के पुनर्गठन के बाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन यानी HSRA का गठन हुआ।इस दौर में भगत सिंह के राजनीतिक विचारों में सामाजिक और आर्थिक समानता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो गया।भारत सरकार के स्रोत बताते हैं कि भगत सिंह की वैचारिक यात्रा में किताबों और राजनीतिक साहित्य की बड़ी भूमिका थी। जेल में उन्होंने लगातार अध्ययन किया और अपने विचारों को लेखों के माध्यम से व्यक्त किया।
लाला लाजपत राय की मौत के बाद बदला घटनाक्रम
साल 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में देशभर में प्रदर्शन हुए। लाहौर में भी इसका विरोध हुआ।प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।इसके बाद भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जे. ए. स्कॉट को निशाना बनाने की योजना बनाई। लेकिन 17 दिसंबर 1928 को हुई कार्रवाई में जे. पी. सॉन्डर्स की हत्या हो गई।भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के विवरण के अनुसार, यह पहचान की गलती का परिणाम था। इस घटना के बाद भगत सिंह और उनके साथी भूमिगत हो गए।
केंद्रीय विधानसभा में बम और गिरफ्तारी
फिर आया 8 अप्रैल 1929।दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंके। यह कार्रवाई ब्रिटिश सरकार के दो प्रस्तावित कानूनों—Public Safety Bill और Trade Disputes Bill—के विरोध में राजनीतिक संदेश देने के उद्देश्य से की गई थी।इसके बाद दोनों ने वहां से भागने के बजाय गिरफ्तारी दी।भारत सरकार के ऐतिहासिक स्रोत के अनुसार, भगत सिंह ने गिरफ्तारी के बाद जेल में रहते हुए साहित्य, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और इतिहास समेत कई विषयों का अध्ययन किया।
जेल में भी जारी रहा पढ़ने और लिखने का सिलसिला
जेल भगत सिंह के लिए सिर्फ कैद की जगह नहीं थी। यह उनके विचारों को और विकसित करने का दौर भी बना।जून 1929 में भगत सिंह और उनके साथियों ने जेल में राजनीतिक कैदियों के साथ व्यवहार को लेकर भूख हड़ताल शुरू की। उनकी मांगों में पढ़ने के लिए किताबें और अखबार उपलब्ध कराने जैसी बातें भी शामिल थीं। सरकारी ऐतिहासिक विवरणों में उनके पत्रों का उल्लेख मिलता है, जिनसे उनके अध्ययन के प्रति गहरी रुचि का पता चलता है।इसी दौर में भगत सिंह के कई लेख और विचार सामने आए। ‘Why I am an Atheist?’ जैसे लेख उनके वैचारिक चिंतन का उदाहरण हैं। सरकारी स्रोत उनके लेखन को उनके राजनीतिक और बौद्धिक विकास से जोड़ते हैं।
लाहौर षड्यंत्र केस
सॉन्डर्स हत्याकांड और अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों के सिलसिले में भगत सिंह पर मुकदमा चला। यह मामला आगे चलकर लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से जाना गया।भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को मौत की सजा सुनाई गई।जेल में रहते हुए भी भगत सिंह का अध्ययन और लेखन जारी रहा। उनके लेखों और पत्रों से यह स्पष्ट होता है कि वे अपने समय के राजनीतिक सवालों पर गंभीरता से विचार करते थे।
23 मार्च 1931—वह दिन जब देश ने तीन क्रांतिकारी खो दिए
फिर आया 23 मार्च 1931।लाहौर जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई।भगत सिंह उस समय सिर्फ 23 वर्ष के थे।इतनी कम उम्र में उनका जीवन समाप्त हो गया, लेकिन उनके विचार और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका भारतीय इतिहास का स्थायी हिस्सा बन गई।उनकी शहादत को याद करते हुए हर वर्ष 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है।
भगत सिंह की विरासत सिर्फ एक तस्वीर नहीं
आज भगत सिंह की तस्वीर देश के स्कूलों, संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों पर दिखाई देती है। लेकिन भगत सिंह की विरासत केवल उनकी तस्वीर या उनके नाम तक सीमित नहीं है।उनकी जिंदगी का एक बड़ा पक्ष उनका अध्ययन था।वे किताबें पढ़ते थे, लिखते थे, राजनीतिक विचारों पर चर्चा करते थे और समाज तथा आर्थिक व्यवस्था पर सवाल उठाते थे। सरकारी स्रोतों में संरक्षित उनके लेख और पत्र आज भी उनके विचारों को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।उनकी कहानी हमें यह बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल एक तरीके या एक विचारधारा की कहानी नहीं था। इसमें अलग-अलग विचार रखने वाले अनेक लोग शामिल थे। भगत सिंह इस व्यापक आंदोलन में क्रांतिकारी धारा के सबसे चर्चित युवाओं में से एक बने।
आज भी क्यों याद किए जाते हैं भगत सिंह?
भगत सिंह की उम्र छोटी थी, लेकिन उनका सार्वजनिक जीवन बेहद प्रभावशाली रहा।एक तरफ उनका परिवार स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा था, दूसरी तरफ उन्होंने खुद इतिहास और राजनीति का अध्ययन किया। उन्होंने पत्रकारिता की, क्रांतिकारी संगठनों के साथ काम किया, ब्रिटिश शासन के खिलाफ राजनीतिक कार्रवाइयों में हिस्सा लिया और जेल में भी लेखन तथा अध्ययन जारी रखा।और अंत में, 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने फांसी का सामना किया।“किसी इंसान की उम्र उसके जीवन की लंबाई तय कर सकती है, लेकिन उसके विचारों की उम्र नहीं। भगत सिंह की जिंदगी छोटी रही, लेकिन उनके विचारों और उनके नाम ने इतिहास में लंबी जगह बनाई।”
माटी का वह लाल, जिसने गुलामी के दौर में आजादी का सपना देखा।
वह युवा, जिसने किताबों को हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
वह क्रांतिकारी, जिसने अपने विचारों को आखिरी समय तक नहीं छोड़ा।
Read on:http://18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया पर SC सख्त, केंद्र से जवाब
Advertisement visit our officehttp://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

