दिल्ली में फिर निर्भया जैसी वारदात: 2012 के बाद महिला अपराध के आंकड़े

Editorial
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नई दिल्ली देश की राजधानी दिल्ली में 16 वर्षीय किशोरी के साथ चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आने के बाद महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्रेटर नोएडा से दिल्ली के कश्मीरी गेट तक जाने वाली बस में हुई इस घटना ने 2012 के निर्भया कांड की यादें ताजा कर दी हैं। घटना के बाद पुलिस ने बस के चालक और कंडक्टर को गिरफ्तार किया है और मामले की जांच जारी है।इस घटना ने सिर्फ सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर किया है कि 16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के बाद कानूनों में बड़े बदलाव होने के बावजूद महिला अपराध की स्थिति कितनी बदली है? क्या सख्त कानून अपराध रोकने में प्रभावी साबित हुए हैं या अब भी पुलिसिंग, सार्वजनिक परिवहन की निगरानी और त्वरित न्याय व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है?

क्या है दिल्ली की हालिया घटना?

मामला 4 अगस्त 2026 का बताया गया है। मैनपुरी की रहने वाली 16 वर्षीय छात्रा नोएडा के सेक्टर-63 में रहने वाले अपने चचेरे भाई के घर जाने के लिए निकली थी। बारिश के दौरान उसने ग्रेटर नोएडा के परी चौक से दिल्ली की ओर जा रही एक स्लीपर बस में सफर शुरू किया।आरोप है कि बस में चालक और कंडक्टर ने किशोरी के साथ अपराध किया और बाद में उसे कश्मीरी गेट के पास छोड़ दिया। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने संबंधित बस को भी कब्जे में लेकर जांच के लिए भेजा है।घटना में बस ने करीब 47 किलोमीटर का सफर तय किया। इस दौरान सार्वजनिक परिवहन में निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं। बस में पर्दे लगे होने की जानकारी सामने आने के बाद यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए परिवहन व्यवस्था में निगरानी बढ़ाने की जरूरत पर भी चर्चा शुरू हुई है।

2012 का निर्भया कांड क्यों बना ऐतिहासिक मोड़?

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना हुई थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इसके बाद महिलाओं की सुरक्षा, पुलिस व्यवस्था, कानून और न्याय प्रणाली में व्यापक बदलाव की मांग तेज हुई।निर्भया कांड के बाद देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े कानूनों को अधिक सख्त बनाने की दिशा में कदम उठाए गए।2013 में आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम लागू किया गया। इसके तहत दुष्कर्म की कानूनी परिभाषा का विस्तार किया गया और यौन उत्पीड़न, पीछा करना, झांकना तथा एसिड अटैक जैसे अपराधों के लिए अलग-अलग प्रावधान किए गए।गंभीर मामलों में सजा को भी कठोर किया गया। दुष्कर्म के कारण पीड़िता की मौत या स्थायी गंभीर अवस्था में पहुंचने की स्थिति में मृत्युदंड तक का प्रावधान किया गया।

कानून बदले, लेकिन क्या अपराध कम हुए?

कानून में बदलाव के बावजूद दिल्ली में दुष्कर्म के मामलों के आंकड़ों को देखें तो तस्वीर पूरी तरह सीधी नहीं रही। 2012 में दिल्ली में दुष्कर्म के 706 मामले दर्ज हुए थे। इसके बाद 2013 में यह संख्या बढ़कर 1,636 हो गई और 2014 में 2,166 मामले दर्ज हुए।2015 से 2019 के बीच भी दिल्ली में हर साल दो हजार से ज्यादा दुष्कर्म के मामले दर्ज होते रहे।

आंकड़े इस प्रकार रहे:

  • 2012: 706 मामले
  • 2013: 1,636 मामले
  • 2014: 2,166 मामले
  • 2015: 2,199 मामले
  • 2016: 2,155 मामले
  • 2017: 2,146 मामले
  • 2018: 2,135 मामले
  • 2019: 2,168 मामले
  • 2020: 1,699 मामले
  • 2021: 2,076 मामले
  • 2022: 1,204 मामले
  • 2023: 1,088 मामले
  • 2024: 1,058 मामले

इन आंकड़ों से यह जरूर दिखता है कि हाल के वर्षों में दर्ज दुष्कर्म के मामलों की संख्या 2015-19 के मुकाबले कम हुई है। हालांकि, किसी भी एक साल के आंकड़े से महिला सुरक्षा की पूरी तस्वीर तय नहीं की जा सकती। अपराध की रिपोर्टिंग, पुलिस में शिकायत दर्ज होने की प्रक्रिया, जांच और न्यायिक कार्रवाई जैसे कई पहलू भी महत्वपूर्ण होते हैं।

देशभर में क्या स्थिति है?

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB के 2024 के आंकड़ों के अनुसार देशभर में दुष्कर्म के 29,536 मामले दर्ज किए गए। इनमें बड़ी संख्या ऐसे मामलों की रही जिनमें आरोपी पीड़िता का परिचित था।रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में दर्ज मामलों में करीब 96.8 प्रतिशत मामलों में आरोपी पीड़िता का जानकार था। इनमें दोस्त, ऑनलाइन परिचित, लिव-इन पार्टनर, शादी का झांसा देने वाला या पति जैसी श्रेणियां शामिल थीं।राज्यों की बात करें तो 2024 में राजस्थान में दुष्कर्म के सबसे अधिक 4,871 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 3,209, महाराष्ट्र में 3,091 और मध्य प्रदेश में 3,061 मामले दर्ज हुए।यह आंकड़ा इस बात की ओर भी संकेत करता है कि महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध केवल किसी एक शहर या राज्य की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह देशव्यापी चुनौती है।

दुष्कर्म के साथ हत्या के कितने मामले?

NCRB ने दुष्कर्म या सामूहिक दुष्कर्म के साथ हत्या के मामलों के लिए अलग श्रेणी रखी है। 2024 में देशभर में ऐसे 266 मामले दर्ज किए गए और इनमें 274 पीड़ित रहे।मध्य प्रदेश में ऐसे सबसे अधिक 50 मामले दर्ज हुए। राजस्थान में 38, महाराष्ट्र में 24, उत्तर प्रदेश में 23 और ओडिशा में 17 मामले दर्ज किए गए।दिल्ली में 2024 के दौरान दुष्कर्म या सामूहिक दुष्कर्म के साथ हत्या के छह मामले दर्ज हुए, जिनमें सात पीड़ित रहे।

बच्चों के खिलाफ अपराध की तस्वीर भी चिंताजनक

बच्चों से जुड़े यौन अपराधों पर भी आंकड़े चिंता पैदा करते हैं। 2024 में देशभर में बच्चों से दुष्कर्म के 979 मामले दर्ज किए गए और इनमें 997 बच्चे पीड़ित रहे।उत्तर प्रदेश में ऐसे सबसे अधिक 459 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद तेलंगाना में 127, केरल में 81 और गुजरात में 65 मामले दर्ज हुए।बच्चों की सुरक्षा के लिए कानूनों में अलग और कठोर प्रावधान मौजूद हैं। इसके बावजूद जागरूकता, परिवारों की सतर्कता, स्कूलों में सुरक्षा व्यवस्था और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई महत्वपूर्ण बनी हुई है।

कितने मामले अदालतों में लंबित?

महिला सुरक्षा का मुद्दा केवल एफआईआर और गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। न्याय मिलने की गति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।NCRB के अनुसार, 2024 के अंत तक देशभर में दुष्कर्म के 1,85,785 मामले अदालतों में लंबित थे। इनमें महिलाओं से जुड़े 1,63,247 और लड़कियों से जुड़े 22,538 मामले शामिल थे।दुष्कर्म के मामलों में कुल लंबितता दर करीब 89.8 प्रतिशत रही। इसका मतलब है कि साल के अंत तक अदालतों में सुनवाई के लिए मौजूद बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा नहीं हो पाया था।

नए कानून में क्या बदला?

1 जुलाई 2024 से देश में भारतीय न्याय संहिता यानी BNS लागू हुई, जिसने भारतीय दंड संहिता यानी IPC की जगह ली। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से जुड़े प्रावधानों को नए कानूनी ढांचे में शामिल किया गया है।नए कानून में गंभीर यौन अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान है। नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म जैसे मामलों में सजा और भी कड़ी हो सकती है।दुष्कर्म के मामलों की जांच को समयबद्ध करने के लिए भी प्रावधान किए गए हैं। साथ ही पीड़िता के बयान को दर्ज करने, चिकित्सा जांच और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के लिए तकनीकी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया है।ई-साक्ष्य और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल जांच और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के लिए किया जा रहा है।

असली चुनौती सिर्फ कानून नहीं, उसका प्रभावी क्रियान्वयन

निर्भया कांड के बाद कानून निश्चित तौर पर बदले हैं। सजा के प्रावधान सख्त हुए हैं और जांच प्रक्रिया में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा है। लेकिन दिल्ली की हालिया घटना यह सवाल फिर खड़ा करती है कि क्या कानूनों के साथ-साथ जमीनी स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत हुई है?सार्वजनिक परिवहन में सीसीटीवी, जीपीएस आधारित निगरानी, बसों की नियमित जांच, ड्राइवर-कंडक्टर का सत्यापन, यात्रियों की शिकायत व्यवस्था और संवेदनशील इलाकों में पुलिस की मौजूदगी जैसे कदम महिला सुरक्षा को मजबूत कर सकते हैं।महिलाओं और बच्चियों को सुरक्षित माहौल देने के लिए कानून के साथ-साथ समाज, पुलिस, परिवहन विभाग, प्रशासन और न्याय व्यवस्था—सभी को मिलकर काम करना होगा।दिल्ली की हालिया घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि निर्भया कांड के 14 साल बाद राजधानी कितनी बदली है? आंकड़े बताते हैं कि हाल के वर्षों में दर्ज मामलों में कमी आई है, लेकिन अपराध की घटनाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। इसलिए चुनौती अब सिर्फ कानून को सख्त बनाने की नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था को ऐसा बनाने की है जिसमें महिलाएं और बच्चियां बिना डर के सार्वजनिक स्थानों और परिवहन का इस्तेमाल कर सकें।

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