लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कानूनी कार्यवाही में अम्बेडकर नगर के पूर्व विधायक पवन पांडेय को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ से बड़ा झटका लगा है। पिछले लगभग चार वर्षों से जेल में बंद पूर्व विधायक की जमानत याचिका अदालत ने खारिज कर दी। अदालत के इस फैसले के बाद फिलहाल उनकी रिहाई की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है और उन्हें अभी जेल में ही रहना होगा।यह फैसला जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने सुनाया। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और पीड़ित पक्ष ने जमानत का विरोध किया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने जमानत देने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने खारिज की जमानत याचिका
पूर्व विधायक पवन पांडेय की ओर से लंबे समय से जेल में रहने का हवाला देते हुए जमानत की मांग की गई थी। याचिका में अदालत से राहत देने का अनुरोध किया गया था।मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए अपना पक्ष रखा। दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत के आदेश के बाद फिलहाल पूर्व विधायक को जेल में ही रहना होगा।

चार साल से जेल में हैं पूर्व विधायक
बताया गया कि पवन पांडेय पिछले करीब चार वर्षों से न्यायिक हिरासत में हैं। इस दौरान उन्होंने जमानत के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिल सकी।लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बीच हाईकोर्ट के इस ताजा आदेश को मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि मुकदमे की सुनवाई और आगे की कानूनी प्रक्रिया अलग विषय है, जिस पर अदालत में कार्यवाही जारी रहेगी।
सरकार की ओर से मजबूती से रखा गया पक्ष
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता (Additional Advocate General) विनोद शाही और अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) अनुराग वर्मा ने अदालत में सरकार का पक्ष रखा। सरकारी पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए अदालत के समक्ष अपने तर्क प्रस्तुत किए।सरकारी अधिवक्ताओं ने मामले की गंभीरता और उपलब्ध तथ्यों का हवाला देते हुए जमानत नहीं दिए जाने की मांग की।
पीड़ित पक्ष ने भी किया विरोध
मामले में पीड़ित पक्ष की ओर से भी अदालत में विस्तृत पैरवी की गई। पीड़ित पक्ष का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता नदीम मुर्तज़ा, अनुराग सिंह, देवांश विक्रम सिंह और आकांक्षा गुप्ता ने किया।पीड़ित पक्ष ने भी अदालत से जमानत याचिका खारिज करने की मांग की। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।

फैसले के बाद बढ़ी राजनीतिक चर्चा
पूर्व विधायक से जुड़े इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है। अम्बेडकर नगर की राजनीति में पवन पांडेय का नाम लंबे समय से चर्चा में रहा है। ऐसे में हाईकोर्ट के इस आदेश को राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।हालांकि अदालत का यह आदेश केवल जमानत याचिका से संबंधित है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मुकदमे का अंतिम निर्णय हो गया है। मामले की सुनवाई संबंधित अदालत में कानून के अनुसार आगे भी जारी रहेगी।
जमानत और मुकदमे में क्या अंतर?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, जमानत याचिका खारिज होने का अर्थ दोषसिद्धि नहीं होता। जमानत केवल यह तय करती है कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपी को रिहाई मिलेगी या नहीं। जबकि किसी व्यक्ति के दोषी या निर्दोष होने का अंतिम फैसला मुकदमे की सुनवाई पूरी होने और अदालत के अंतिम निर्णय के बाद ही होता है।इसी कारण जमानत पर आया आदेश और अंतिम फैसला अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।
आगे क्या हो सकता है?
हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद अब कानूनी रूप से आगे के विकल्प खुले रह सकते हैं। संबंधित पक्ष कानून के अनुसार उपलब्ध अन्य न्यायिक उपायों का सहारा ले सकता है। हालांकि इस संबंध में आगे क्या कदम उठाया जाएगा, इस पर अभी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी नजरें
इस मामले में अब सभी की निगाहें आगे की न्यायिक कार्यवाही पर रहेंगी। मुकदमे की सुनवाई, गवाहों के बयान, प्रस्तुत साक्ष्य और अदालत की आगामी कार्यवाही के आधार पर ही भविष्य की दिशा तय होगी।हाईकोर्ट का यह आदेश फिलहाल इतना स्पष्ट करता है कि पूर्व विधायक पवन पांडेय को इस चरण में जमानत नहीं मिलेगी और वे न्यायिक हिरासत में ही रहेंगे।
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