यूपी में ‘महागठबंधन’ पर महाभारत! सीट बंटवारे को लेकर सपा-कांग्रेस आमने-सामने, चुनाव से पहले बढ़ी तकरार

Editorial
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लखनऊ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी करीब छह से सात महीने का समय बाकी है, लेकिन विपक्षी गठबंधन के भीतर सियासी तापमान अभी से चढ़ने लगा है। समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर शुरू हुई रस्साकशी अब सार्वजनिक बयानबाजी तक पहुंच गई है। दोनों दल एक-दूसरे पर सीधे हमले तो नहीं कर रहे, लेकिन नेताओं के बयान यह संकेत जरूर दे रहे हैं कि सीटों को लेकर सहमति बनाना आसान नहीं होगा।एक ओर कांग्रेस गठबंधन में सम्मानजनक और बराबरी की हिस्सेदारी” की मांग पर अड़ी दिखाई दे रही है, तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी साफ संदेश दे रही है कि गठबंधन का आधार केवल वही सीटें होंगी, जहां जीत की वास्तविक संभावना हो।यानी, यूपी में भाजपा को चुनौती देने से पहले विपक्षी खेमे को अपने ही घर की सियासी गांठें खोलनी पड़ सकती हैं।

150 से ज्यादा सीटों पर कांग्रेस की नजर, सपा अभी संख्या बताने से बच रही

सूत्रों और राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चाओं के अनुसार कांग्रेस इस बार विधानसभा चुनाव में 150 से अधिक सीटों पर दावा पेश करने की तैयारी में है। पार्टी का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसके बेहतर प्रदर्शन ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में उसकी स्थिति मजबूत की है और अब उसे उसी अनुपात में विधानसभा चुनाव में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।दूसरी ओर समाजवादी पार्टी अभी सीटों की संख्या पर खुलकर कुछ नहीं कह रही। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि सीटों का बंटवारा केवल आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि जीतने की क्षमता (Winnability) के आधार पर होना चाहिए।सपा नेताओं का तर्क है कि यदि लक्ष्य भाजपा को हराना है तो सीटों की संख्या नहीं, बल्कि जीत की संभावना सबसे महत्वपूर्ण मानदंड होना चाहिए।

लोकसभा चुनाव के नतीजों को कांग्रेस बना रही अपनी ताकत

कांग्रेस लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष को मिली सफलता गठबंधन की वजह से संभव हुई।कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पार्टी के साथ आने से विपक्षी वोटों का बिखराव रुका और इसका सीधा फायदा समाजवादी पार्टी को मिला।इसी आधार पर कांग्रेस अब विधानसभा चुनाव में भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी के रूप में पेश कर रही है।

बयानों से बढ़ी तल्खी, नेताओं के बीच जुबानी जंग तेज

दोनों दलों के बीच मतभेद केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रहे। हाल के दिनों में कई नेताओं के बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गए।कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी 120 सीटें भी नहीं जीत सकी थी। उनका दावा था कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन होने के बाद ही सपा की सीटों की संख्या बढ़कर 37 तक पहुंची।इस बयान को समाजवादी पार्टी ने पसंद नहीं किया।

सपा का पलटवार—’मर्यादा में रहकर करें बयानबाजी’

इमरान मसूद के बयान पर समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन ने तीखी प्रतिक्रिया दी।उन्होंने कहा कि कुछ लोग बिना वजह बयान देकर गठबंधन की मर्यादा को नुकसान पहुंचा रहे हैं।सुमन ने स्पष्ट कहा कि यदि गठबंधन को मजबूत रखना है तो सार्वजनिक मंचों पर संयम और सौहार्द बनाए रखना जरूरी है।राजनीतिक जानकार इसे दोनों दलों के बीच बढ़ती असहजता का संकेत मान रहे हैं।

‘छोटे भाई’ की भूमिका स्वीकार नहीं करेगी कांग्रेस

यूपी कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने भी हाल ही में साफ शब्दों में कहा कि कांग्रेस इस बार विधानसभा चुनाव “सम्मान और बराबरी” के आधार पर लड़ेगी।उनके इस बयान को राजनीतिक विश्लेषक बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं।इसका सीधा संदेश यह माना जा रहा है कि कांग्रेस अब गठबंधन में केवल सहयोगी दल बनकर नहीं रहना चाहती, बल्कि निर्णय लेने में बराबर की भागीदारी चाहती है।यानी कांग्रेस इस बार “छोटे भाई” की भूमिका निभाने को तैयार नहीं दिख रही।

सपा का गणित अलग, जीतने वाली सीटों पर ही जोर

समाजवादी पार्टी अपने पुराने चुनावी आंकड़ों का हवाला देकर कांग्रेस के दावे को कमजोर बताने की कोशिश कर रही है।

सपा नेताओं का कहना है कि—

  • 2022 में कांग्रेस को गठबंधन के तहत लगभग 107 सीटें दी गई थीं।
  • इसके बावजूद कांग्रेस केवल 7 सीटें ही जीत सकी।
  • जब कांग्रेस ने अलग चुनाव लड़ा तो उसे मात्र दो सीटों पर सफलता मिली।

सपा का कहना है कि ऐसे में सीटों की संख्या बढ़ाने के बजाय उन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए जहां विपक्ष वास्तव में भाजपा को चुनौती दे सकता है।

बसपा का नाम लेकर दबाव बनाने की कोशिश?

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस समय-समय पर बसपा के साथ संभावित गठबंधन के संकेत देकर समाजवादी पार्टी पर दबाव बनाने की कोशिश करती रही है।हालांकि बहुजन समाज पार्टी ने अब तक ऐसे किसी भी राजनीतिक संकेत को गंभीरता से नहीं लिया है।बसपा लगातार अपने दम पर चुनाव लड़ने की बात कहती रही है।

क्या गठबंधन पर पड़ सकता है असर?

विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक बयानबाजी यदि इसी तरह जारी रही तो गठबंधन की बातचीत मुश्किल हो सकती है।हालांकि दोनों दलों की प्राथमिकता भाजपा के खिलाफ संयुक्त लड़ाई बताई जा रही है, लेकिन सीटों का सवाल जितना लंबा खिंचेगा, उतना ही कार्यकर्ताओं में भ्रम बढ़ सकता है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी रणनीति में सीटों का बंटवारा सबसे संवेदनशील मुद्दा होता है और यदि समय रहते सहमति नहीं बनी तो इसका असर चुनावी तैयारियों पर भी पड़ सकता है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल दोनों दल अपने-अपने राजनीतिक संदेश देने में जुटे हैं। कांग्रेस सम्मानजनक हिस्सेदारी की मांग को लेकर दबाव बना रही है, जबकि समाजवादी पार्टी जीत की क्षमता को आधार बनाने पर जोर दे रही है।आने वाले हफ्तों में दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच औपचारिक बातचीत होने की संभावना है। माना जा रहा है कि अंतिम फैसला उसी स्तर पर होगा।लेकिन फिलहाल इतना तय है कि यूपी विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष के भीतर सीटों का गणित ही सबसे बड़ा सियासी मुद्दा बन चुका है। गठबंधन मजबूत रहेगा या सीटों की खींचतान नई मुश्किलें खड़ी करेगी, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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