उमाशंकर सिंह का राजनीतिक सफर: बसपा के इकलौते विधायक, तीन बार की जीत से बने पूर्वांचल का बड़ा चेहरा

Editorial
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वाराणसी उत्तर प्रदेश की राजनीति को गुरुवार को उस समय बड़ा झटका लगा, जब बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के विधायक उमाशंकर सिंह का दिल्ली में निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। बसपा के लिए यह क्षति इसलिए भी बड़ी मानी जा रही है क्योंकि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में जब पार्टी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था, तब उमाशंकर सिंह ही बसपा के टिकट पर जीतने वाले इकलौते विधायक थे। बाद में उन्हें बसपा विधायक दल का नेता भी बनाया गया।

कौन थे उमाशंकर सिंह?

उमाशंकर सिंह का जन्म 2 जनवरी 1971 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के खनवर गांव में हुआ था। उनके पिता घुराहु सिंह भारतीय सेना के सेवानिवृत्त जवान थे। अनुशासित पारिवारिक माहौल में पले-बढ़े उमाशंकर सिंह ने सामाजिक जीवन से शुरुआत की और धीरे-धीरे राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई।उनकी छवि एक ऐसे जनप्रतिनिधि की रही जो क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहते थे और लोगों की समस्याओं को लेकर प्रशासन से सीधे संवाद करते थे। यही कारण था कि रसड़ा क्षेत्र में उनका जनाधार लगातार मजबूत होता गया।

साल 2000 से शुरू हुआ राजनीतिक सफर

उमाशंकर सिंह का राजनीतिक सफर वर्ष 2000 में शुरू हुआ, जब वे बलिया जिला पंचायत अध्यक्ष चुने गए। यही जीत उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इसके बाद उन्होंने मुख्यधारा की राजनीति में कदम रखा और बसपा के साथ जुड़कर संगठन में अपनी मजबूत पहचान बनाई।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिला पंचायत स्तर से लेकर विधानसभा तक का उनका सफर संगठनात्मक मेहनत और क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहने का परिणाम था।

लगातार तीन बार विधायक बनने का रिकॉर्ड

उमाशंकर सिंह ने पहली बार 2012 में रसड़ा विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया। इसके बाद उन्होंने 2017 और 2022 में भी लगातार जीत दर्ज की।लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव जीतना इस बात का प्रमाण माना जाता है कि क्षेत्र की जनता का उन पर गहरा विश्वास था। विकास कार्यों, जनसंपर्क और क्षेत्रीय मुद्दों पर सक्रियता ने उन्हें रसड़ा की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा बना दिया।

2022 में बसपा की सबसे बड़ी उम्मीद बने

वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव बहुजन समाज पार्टी के लिए बेहद कठिन साबित हुआ। पार्टी प्रदेश में लगभग पूरी तरह सिमट गई, लेकिन रसड़ा सीट पर उमाशंकर सिंह ने शानदार जीत दर्ज कर बसपा का विधानसभा में खाता खोला।वे पूरे उत्तर प्रदेश में बसपा के इकलौते विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे। पार्टी नेतृत्व ने उनकी निष्ठा और संगठनात्मक क्षमता को देखते हुए उन्हें बसपा विधायक दल का नेता नियुक्त किया। उस समय राजनीतिक हलकों में कहा गया कि कठिन दौर में उमाशंकर सिंह ने बसपा की राजनीतिक मौजूदगी को बचाए रखा।

जनता के बीच मजबूत पकड़

राजनीति के अलावा उमाशंकर सिंह व्यवसाय और सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे। क्षेत्र में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य स्थानीय समस्याओं को लेकर उनकी सक्रियता चर्चा में रहती थी।स्थानीय लोगों के अनुसार, वे आम जनता से सीधे संवाद करने वाले नेता थे। यही वजह रही कि लगातार तीन चुनावों में उन्हें जनता का समर्थन मिलता रहा। समर्थक उन्हें एक सहज, उपलब्ध और प्रभावशाली जनप्रतिनिधि के रूप में याद करते हैं।

दयाशंकर सिंह के साथ विवाद ने बटोरी सुर्खियां

उमाशंकर सिंह का नाम कई बार योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री दयाशंकर सिंह के साथ राजनीतिक टकराव को लेकर भी चर्चा में रहा।यह विवाद मुख्य रूप से कटहल नाला पुल को बिना औपचारिक उद्घाटन के यातायात के लिए खोलने के मुद्दे पर सामने आया था। मंत्री दयाशंकर सिंह ने सार्वजनिक रूप से अधिकारियों पर आरोप लगाया कि वे बसपा विधायक के दबाव में काम कर रहे हैं।इसके जवाब में उमाशंकर सिंह ने प्रेस वार्ता कर कहा कि संबंधित पुल एनएचएआई के अधीन है, इसलिए उद्घाटन और संचालन का निर्णय उसी के अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने मंत्री पर पलटवार करते हुए कहा था कि यदि वे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू करेंगे तो कई तथ्य सार्वजनिक हो सकते हैं। यह विवाद लंबे समय तक पूर्वांचल की राजनीति में चर्चा का विषय बना रहा।

आयकर विभाग की कार्रवाई भी रही चर्चा में

वर्ष 2026 में आयकर विभाग ने उमाशंकर सिंह और उनके करीबियों से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की थी। जांच के दौरान उनके करीबियों के ठिकानों से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने की जानकारी सामने आई थी।लखनऊ के गोमती नगर स्थित आवास, कार्यालय और बलिया के खनवर गांव में भी आयकर विभाग ने जांच की थी। इस कार्रवाई के बाद उनका नाम राज्य की राजनीतिक चर्चाओं में प्रमुखता से सामने आया था।

निधन से बसपा को बड़ा झटका

उमाशंकर सिंह के निधन को बसपा के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान माना जा रहा है। वे विधानसभा में पार्टी की अकेली आवाज थे और विपक्ष के रूप में बसपा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।उनके निधन के बाद बसपा को न केवल एक वरिष्ठ नेता का नुकसान हुआ है, बल्कि पूर्वांचल में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर भी इसका असर पड़ सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।

शोक की लहर, नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

उमाशंकर सिंह के निधन पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बसपा प्रमुख मायावती, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव सहित विभिन्न दलों के नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया। मायावती स्वयं लखनऊ स्थित उनके आवास पहुंचीं और परिवार से मिलकर संवेदनाएं व्यक्त कीं।राजनीतिक दलों से जुड़े कई नेताओं और समर्थकों ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके जनसेवा के कार्यों को याद किया।उमाशंकर सिंह का राजनीतिक जीवन संघर्ष, संगठन के प्रति निष्ठा और जनता से गहरे जुड़ाव की मिसाल रहा। जिला पंचायत अध्यक्ष से लेकर लगातार तीन बार विधायक बनने और 2022 में बसपा के इकलौते विधायक के रूप में विधानसभा पहुंचने तक का उनका सफर उल्लेखनीय रहा। दयाशंकर सिंह के साथ राजनीतिक विवादों से लेकर क्षेत्रीय विकास के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका तक, उन्होंने हमेशा अपनी अलग पहचान बनाए रखी। उनके निधन के साथ उत्तर प्रदेश, विशेषकर पूर्वांचल की राजनीति ने एक ऐसा चेहरा खो दिया है, जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।

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