संसद में साधु के भेष पर मचा सियासी तूफान! विपक्ष के प्रदर्शन से भड़का संत समाज, स्पीकर से सख्त कार्रवाई की मांग

Editorial
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नई दिल्ली संसद के मानसून सत्र के बीच राम मंदिर के कथित चढ़ावा गड़बड़ी मामले को लेकर विपक्ष के प्रदर्शन ने अब नया राजनीतिक और धार्मिक विवाद खड़ा कर दिया है। संसद भवन के मकर द्वार पर विपक्षी सांसदों द्वारा किए गए सांकेतिक प्रदर्शन में सांसद पप्पू यादव साधु के भेष में दानपेटी लेकर बैठे दिखाई दिए, जबकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत अन्य विपक्षी सांसदों ने प्रतीकात्मक रूप से उसमें चढ़ावा चढ़ाया। इसके बाद जो दृश्य सामने आया, उसने देशभर में बहस छेड़ दी। संत समाज ने इसे साधु-संतों, भगवा वस्त्र और सनातन परंपरा का अपमान बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है, वहीं भाजपा ने भी विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। अब लोकसभा अध्यक्ष से इस पूरे घटनाक्रम पर कार्रवाई की मांग की जा रही है।

कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?

संसद के मानसून सत्र के दसवें दिन विपक्षी दलों ने राम मंदिर में कथित चढ़ावे की गड़बड़ी के मुद्दे को उठाने के लिए संसद परिसर में सांकेतिक प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान पप्पू यादव भगवा वस्त्र पहनकर, माथे पर चंदन लगाकर और हाथ में दानपेटी लेकर संसद के मकर द्वार पर बैठ गए।इसके बाद समाजवादी पार्टी के सांसद डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव, अवधेश प्रसाद और कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत कई विपक्षी सांसदों ने उस दानपेटी में सांकेतिक रूप से चढ़ावा डाला। प्रदर्शन के हिस्से के रूप में पप्पू यादव ने दानपेटी से पैसे निकालकर जेब में रखने और फिर भागने का अभिनय किया। अन्य सांसदों ने उन्हें पकड़ने और मजाकिया अंदाज में रोकने का सांकेतिक प्रदर्शन किया।विपक्ष का कहना था कि यह प्रदर्शन राम मंदिर चढ़ावा मामले में कथित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठाने के उद्देश्य से किया गया था।

संत समाज ने जताई कड़ी नाराजगी

प्रदर्शन के तुरंत बाद अखिल भारतीय संत समिति ने इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी।समिति के महामंत्री जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को सरकार या किसी पार्टी का विरोध करने का पूरा अधिकार है, लेकिन साधु-संतों की वेशभूषा का उपयोग कर पूरे संत समाज को कटघरे में खड़ा करने जैसा संदेश देना बेहद अनुचित है।उन्होंने कहा कि इस तरह का प्रदर्शन भगवा वस्त्र और संत परंपरा की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है। उनके अनुसार यदि विपक्ष इस पर बिना शर्त सार्वजनिक माफी नहीं मांगता, तो लोकसभा अध्यक्ष को पूरे मामले का संज्ञान लेकर उचित कार्रवाई करनी चाहिए।

‘दोषियों पर कार्रवाई हो, लेकिन संतों का अपमान नहीं’

जितेंद्रानंद सरस्वती ने यह भी कहा कि यदि राम मंदिर के चढ़ावे में किसी प्रकार की गड़बड़ी हुई है तो उसकी जांच संबंधित एजेंसियां कर रही हैं। कानून अपना काम करेगा और जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच के नाम पर पूरे संत समाज और भगवा परंपरा को विवाद में घसीटना उचित नहीं माना जा सकता।

भाजपा ने भी विपक्ष को घेरा

भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने भी विपक्ष के प्रदर्शन पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और विपक्ष लगातार संत समाज, भगवा और सनातन परंपरा का अपमान करते रहे हैं।साक्षी महाराज ने कहा कि संसद परिसर में जिस तरह साधु का वेश धारण कर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की गई, वह करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को आहत करने वाला है। उन्होंने भी लोकसभा अध्यक्ष से इस पूरे मामले पर कार्रवाई की मांग की।

विपक्ष का उद्देश्य क्या था?

विपक्षी दलों का कहना है कि उनका प्रदर्शन पूरी तरह सांकेतिक था और उसका मकसद राम मंदिर के कथित चढ़ावा विवाद को संसद और देश के सामने उठाना था। प्रदर्शन के दौरान दानपेटी, चढ़ावा और भागने का अभिनय इसी प्रतीकात्मक विरोध का हिस्सा बताया गया।हालांकि इस प्रदर्शन की शैली को लेकर अब राजनीतिक और धार्मिक संगठनों में तीखी बहस छिड़ गई है।

संसद में फिर हंगामे की भेंट चढ़ा मानसून सत्र

मानसून सत्र का दसवां दिन भी हंगामे के कारण प्रभावित रहा। विपक्ष राम मंदिर के कथित चढ़ावा मामले और छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों पर चर्चा की मांग करता रहा।विपक्ष ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की गैरमौजूदगी पर भी सवाल उठाए। लगातार हंगामे के बीच सदन की कार्यवाही बाधित होती रही। हालांकि इसी दौरान जन्म-मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा से पारित कर दिया गया।अंततः हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही 3 अगस्त तक स्थगित कर दी गई।

अब नजर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर

संत समाज की मांग के बाद अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि इस मामले में कोई औपचारिक शिकायत या विशेषाधिकार संबंधी मामला उठता है, तो संसद के भीतर इस पर आगे की प्रक्रिया तय हो सकती है।फिलहाल विपक्ष अपने प्रदर्शन को लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा बता रहा है, जबकि भाजपा और संत समाज इसे धार्मिक प्रतीकों और संत परंपरा के अपमान के रूप में देख रहे हैं।

देशभर में छिड़ी नई बहस

यह विवाद अब केवल संसद परिसर तक सीमित नहीं रह गया है। सोशल मीडिया पर भी लोग दो अलग-अलग मतों में बंटे दिखाई दे रहे हैं। एक पक्ष इसे राजनीतिक व्यंग्य और सांकेतिक विरोध बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष धार्मिक भावनाओं और संत परंपरा के सम्मान से जोड़कर देख रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक विरोध और धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा संवेदनशील विषय रहा है।संसद परिसर में विपक्ष के सांकेतिक प्रदर्शन ने एक नए राजनीतिक और सामाजिक विवाद को जन्म दे दिया है। राम मंदिर के कथित चढ़ावा मामले को उठाने के लिए अपनाए गए प्रदर्शन के तरीके पर अब तीखी बहस छिड़ गई है। संत समाज इसे भगवा और साधु-संतों की गरिमा पर चोट मान रहा है, जबकि विपक्ष इसे अपने विरोध का लोकतांत्रिक माध्यम बता रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि लोकसभा अध्यक्ष इस मामले पर कोई कार्रवाई करते हैं या नहीं, और आने वाले दिनों में यह विवाद संसद से लेकर देश की राजनीति तक कितना असर डालता है।

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