Prashant Kishor Biography: कौन हैं प्रशांत किशोर? चुनावी रणनीतिकार से विधायक बनने तक का सफर, 31 साल बाद बांकीपुर में BJP का गढ़ ढहाकर रचा इतिहास

Editorial
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पटना बिहार की राजनीति में लंबे समय से चर्चा का केंद्र रहे जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (पीके) ने आखिरकार वह कर दिखाया जिसकी चर्चा पिछले कई वर्षों से हो रही थी। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव 2026 में शानदार जीत दर्ज कर उन्होंने न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तीन दशक पुराने गढ़ को ध्वस्त किया, बल्कि चुनावी रणनीतिकार से जननेता बनने तक के अपने सफर को भी नई पहचान दे दी। यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जा रही है क्योंकि बांकीपुर सीट पर भाजपा का दबदबा करीब 31 वर्षों और लगातार नौ चुनावों से कायम था।कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी अभियान की रणनीति तैयार करने वाले प्रशांत किशोर आज उसी भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ में जीत हासिल कर बिहार की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए हैं।

बांकीपुर की जीत ने बदल दी राजनीतिक तस्वीर

बांकीपुर सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई थी। नितिन नवीन लगातार पांच बार इस सीट से विधायक रहे थे। उनसे पहले उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा भी भाजपा के टिकट पर लगातार चार बार चुनाव जीत चुके थे।यानी यह सीट तीन दशकों से भाजपा का अभेद्य किला मानी जाती थी। लेकिन 2026 के उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने इस मजबूत राजनीतिक समीकरण को बदल दिया और जन सुराज पार्टी को पहली बड़ी चुनावी सफलता दिला दी।

कौन हैं प्रशांत किशोर?

प्रशांत किशोर का जन्म 20 मार्च 1977 को बिहार के रोहतास (सासाराम क्षेत्र) से जुड़े एक परिवार में हुआ। उनके पिता डॉ. श्रीकांत पांडेय चिकित्सक थे, जबकि उनकी मां सुशीला पांडेय गृहिणी थीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बिहार में हुई और बाद में उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की।राजनीति में आने से पहले प्रशांत किशोर का करियर पूरी तरह सामाजिक विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा रहा। उन्होंने कई वर्षों तक संयुक्त राष्ट्र समर्थित स्वास्थ्य कार्यक्रमों में काम किया और अफ्रीकी देश चाड में यूनिसेफ के साथ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।

एक रिसर्च रिपोर्ट ने बदल दी जिंदगी

प्रशांत किशोर ने भारत में कुपोषण और आर्थिक विकास पर एक विस्तृत अध्ययन तैयार किया था। इसी रिपोर्ट के माध्यम से उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बनी।बताया जाता है कि इसी दौरान उनकी मुलाकात गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई। मोदी उनके विचारों और विश्लेषण से प्रभावित हुए और उन्हें चुनावी रणनीति तैयार करने वाली टीम का हिस्सा बनाया।यहीं से प्रशांत किशोर की राजनीतिक यात्रा शुरू हुई।

2014 में मोदी अभियान के बने अहम रणनीतिकार

2014 के लोकसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने भाजपा के चुनाव अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। “चाय पर चर्चा”, 3D रैली, डिजिटल प्रचार और जमीनी स्तर पर मतदाताओं तक पहुंचने जैसे कई अभिनव अभियान उसी दौर में चर्चा का विषय बने।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन अभियानों ने भाजपा की चुनावी सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भाजपा से अलग होकर बने ‘किंगमेकर’

2014 के बाद प्रशांत किशोर भाजपा से अलग हो गए और उन्होंने आई-पैक (Indian Political Action Committee) की स्थापना की।इसके बाद उन्होंने कई राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति तैयार की।उनकी रणनीति से लाभ पाने वाले प्रमुख दलों में शामिल रहे—

  • जनता दल (यूनाइटेड)
  • राष्ट्रीय जनता दल
  • कांग्रेस
  • तृणमूल कांग्रेस
  • आम आदमी पार्टी
  • वाईएसआर कांग्रेस
  • डीएमके

इसी दौर में उन्हें देश का सबसे सफल चुनावी रणनीतिकार और “किंगमेकर” कहा जाने लगा।

नीतीश कुमार के साथ राजनीति में एंट्री

2018 में प्रशांत किशोर ने पहली बार सक्रिय राजनीति में कदम रखा और जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल हो गए। उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया।हालांकि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) समेत कई मुद्दों पर मतभेद बढ़ने के बाद वर्ष 2020 में उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया।

रणनीतिकार की भूमिका छोड़ी, बिहार लौटे

2021 में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चुनावों के बाद प्रशांत किशोर ने चुनावी रणनीतिकार की भूमिका से अलग होने की घोषणा की।उन्होंने कहा कि अब उनका पूरा ध्यान बिहार के विकास और राजनीति को नई दिशा देने पर रहेगा।इसके बाद उन्होंने पूरे बिहार में लंबी जन सुराज पदयात्रा शुरू की। गांव-गांव जाकर लोगों से संवाद किया और राज्य की समस्याओं को समझने का प्रयास किया।

जन सुराज पार्टी की स्थापना

बिहार में जनसंवाद और पदयात्रा के बाद प्रशांत किशोर ने जन सुराज पार्टी का गठन किया।उनका दावा था कि बिहार की राजनीति को जाति और परिवारवाद से बाहर निकालकर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मुद्दों पर केंद्रित करना ही उनकी राजनीति का उद्देश्य है।

पहला चुनाव हार, लेकिन हौसला नहीं टूटा

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी ने पहली बार चुनाव लड़ा।हालांकि पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन प्रशांत किशोर ने हार के बावजूद बिहार नहीं छोड़ा। उन्होंने लगातार जनता के बीच रहकर संगठन मजबूत करने का काम जारी रखा।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यही लगातार जमीनी सक्रियता बांकीपुर उपचुनाव में उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बनी।

बांकीपुर उपचुनाव क्यों लड़े?

जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन राज्यसभा पहुंचे तो बांकीपुर सीट खाली हुई।प्रशांत किशोर ने इस सीट से खुद चुनाव लड़ने का फैसला किया। यह निर्णय राजनीतिक रूप से बेहद जोखिम भरा माना जा रहा था क्योंकि बांकीपुर भाजपा का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता था।लेकिन पीके ने जनता के बीच लगातार संपर्क अभियान चलाया और विकास, रोजगार तथा स्थानीय मुद्दों को चुनाव का केंद्र बनाया।

31 साल बाद भाजपा का किला ढहा

उपचुनाव के नतीजों ने बिहार की राजनीति को चौंका दिया।लगातार नौ चुनाव जीतने वाली भाजपा को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा और जन सुराज पार्टी ने पहली बार विधानसभा में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।यह जीत केवल एक सीट की सफलता नहीं बल्कि प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत राजनीतिक स्वीकार्यता का भी बड़ा संकेत मानी जा रही है।

अब आगे क्या?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बांकीपुर की जीत के बाद प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में तीसरे बड़े विकल्प के रूप में उभर सकते हैं।हालांकि आगामी विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी कितना प्रभाव छोड़ पाएगी, इसका फैसला जनता करेगी। लेकिन इतना तय है कि बांकीपुर उपचुनाव ने बिहार की राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत कर दी है।चुनावी रणनीतिकार के रूप में पहचान बनाने वाले प्रशांत किशोर ने अब सक्रिय राजनीति में भी बड़ी उपलब्धि हासिल की है। बांकीपुर उपचुनाव में जीत ने यह संदेश दिया है कि लंबी राजनीतिक तैयारी, संगठन निर्माण और जमीनी संपर्क चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं, इस जीत का व्यापक राजनीतिक प्रभाव बिहार की आने वाली राजनीति और विधानसभा चुनावों में और अधिक स्पष्ट होगा।

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