“रिक्शा चलाकर बेटे को बनाया डॉक्टर… लेकिन ड्यूटी पर थम गई जिंदगी! पिता के संघर्ष का सपना एक पल में बिखर गया”

Editorial
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जाैनपुर कभी रिक्शे के पैडल पर पैर रखकर एक पिता अपने बेटे के भविष्य को आगे बढ़ाता था। हर दिन की कमाई में अपने सपनों से ज्यादा बेटे की किताबों की कीमत होती थी। धूप, बारिश और ठंड में सड़कें नापने वाला वह पिता सिर्फ इसलिए थकता नहीं था, क्योंकि उसे विश्वास था कि एक दिन उसका बेटा सफेद कोट पहनकर लोगों की जिंदगी बचाएगा। लेकिन किस्मत ने ऐसा वार किया कि जिस बेटे ने डॉक्टर बनकर अनगिनत मरीजों की सेवा का संकल्प लिया था, उसकी अपनी जिंदगी ड्यूटी के दौरान ही थम गई।उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज से आई इस खबर ने सिर्फ एक परिवार नहीं, बल्कि पूरे समाज को झकझोर दिया है। हड्डी रोग विभाग में कार्यरत जूनियर डॉक्टर (जेआर-2) डॉ. विनोद कुमार बिंद का बृहस्पतिवार सुबह ड्यूटी के दौरान अचानक निधन हो गया। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई। अस्पताल के गलियारों में जहां रोज मरीजों की जिंदगी बचाने की जंग लड़ी जाती है, वहीं उसी अस्पताल में एक युवा डॉक्टर की जिंदगी हमेशा के लिए थम गई।

रिक्शा चालक पिता ने गरीबी को कभी बेटे की पढ़ाई के बीच नहीं आने दिया

जौनपुर जिले के पख्खनपुर सुरिस गांव के रहने वाले डॉ. विनोद कुमार बिंद की कहानी संघर्ष, मेहनत और सपनों की मिसाल रही है। उनके पिता दूधनाथ बिंद पेशे से रिक्शा चालक हैं। सीमित आय, आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने कभी अपने बच्चों की शिक्षा से समझौता नहीं किया।दिनभर रिक्शा चलाकर जो भी कमाई होती, उसका बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च होता। कई बार खुद की जरूरतों को नजरअंदाज किया गया, लेकिन बेटे की किताबें, फीस और पढ़ाई कभी नहीं रुकी। दूधनाथ बिंद का सिर्फ एक सपना था—उनका बेटा डॉक्टर बने और समाज की सेवा करे।सालों की तपस्या रंग लाई। विनोद ने कड़ी मेहनत से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और कानपुर के प्रतिष्ठित जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में जूनियर डॉक्टर के रूप में अपनी पहचान बनाई। गांव के लोगों के लिए वह सिर्फ डॉक्टर नहीं, बल्कि संघर्ष से सफलता तक पहुंचने वाली प्रेरणा थे।

ड्यूटी करते-करते थम गई धड़कन

बृहस्पतिवार सुबह डॉ. विनोद कुमार बिंद अपने नियमित कार्य में व्यस्त थे। मरीजों की सेवा करते हुए अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। अस्पताल में मौजूद चिकित्सकों ने उन्हें बचाने का हरसंभव प्रयास किया, लेकिन प्रारंभिक जानकारी के अनुसार उन्हें हार्ट अटैक आया और उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।जिस अस्पताल में वह दूसरों को नया जीवन देने की कोशिश करते थे, वहीं उनकी जिंदगी का सफर अचानक समाप्त हो गया। इस खबर ने मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों, कर्मचारियों और छात्रों को भी गहरे सदमे में डाल दिया।

परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

डॉ. विनोद तीन भाइयों और दो बहनों में सबसे छोटे थे। बड़े भाई गुलाब बिंद जेसीबी चलाकर परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाते हैं, जबकि दूसरे भाई दिनेश बिंद ट्रैक्टर चलाकर घर का सहारा बने हुए हैं। परिवार की सबसे छोटी बहन वर्तमान में बीएमएस की पढ़ाई कर रही है।घटना की सूचना मिलते ही परिवार के पुरुष सदस्य कानपुर के लिए रवाना हो गए। बताया गया कि देर शाम तक घर की महिला सदस्यों को यह दुखद खबर नहीं बताई गई थी, क्योंकि परिवार को डर था कि यह सदमा उनके लिए असहनीय हो सकता है।जिस घर में डॉक्टर बेटे की उपलब्धियों पर गर्व था, वहां अब सिर्फ सन्नाटा और आंसुओं की आवाज है।

गांव ने खो दिया अपना होनहार बेटा

डॉ. विनोद बिंद सिर्फ अपने परिवार की उम्मीद नहीं थे, बल्कि पूरे गांव का गर्व थे। ग्रामीण बताते हैं कि उन्होंने कभी अपनी सफलता पर घमंड नहीं किया। गांव आने पर लोगों से आत्मीयता से मिलना, जरूरतमंदों की मदद करना और बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करना उनकी पहचान थी।पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष विवेक कुमार उर्फ विक्की यादव ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. विनोद एक मिलनसार, सेवाभावी और प्रतिभाशाली चिकित्सक थे। उनका असमय निधन पूरे क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति है।

संघर्ष की कहानी, जो हर माता-पिता को प्रेरित करती थी

दूधनाथ बिंद की जिंदगी इस बात का उदाहरण थी कि गरीबी कभी सपनों की सबसे बड़ी दुश्मन नहीं होती। रिक्शा चलाने वाला यह पिता अपने बेटे को डॉक्टर बनाकर समाज को यह संदेश देना चाहता था कि मेहनत और शिक्षा से हर मंजिल हासिल की जा सकती है।लेकिन जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया कि जिस बेटे के उज्ज्वल भविष्य के लिए पिता ने अपनी पूरी जवानी संघर्ष में गुजार दी, उसी बेटे की असमय मौत ने परिवार के सारे सपने बिखेर दिए।

एक सवाल जो समाज के सामने भी खड़ा है

डॉ. विनोद बिंद की मौत सिर्फ एक परिवार का निजी दुख नहीं है। यह घटना उन युवा डॉक्टरों की कठिन कार्य परिस्थितियों, लगातार बढ़ते कार्यभार और मानसिक-शारीरिक दबाव पर भी सवाल खड़े करती है। मेडिकल पेशा सेवा का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है, लेकिन लंबे समय तक ड्यूटी, तनाव और लगातार काम करने की परिस्थितियों को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। हालांकि इस मामले में मृत्यु के कारणों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित चिकित्सीय जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

अंतिम शब्द

रिक्शे के पहियों से शुरू हुआ यह सफर मेडिकल कॉलेज तक तो पहुंच गया, लेकिन मंजिल पर पहुंचकर ही रुक गया। एक पिता का संघर्ष, एक बेटे की मेहनत और पूरे परिवार की उम्मीदें… सब कुछ एक पल में बिखर गया।डॉ. विनोद कुमार बिंद अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी हमेशा यह याद दिलाती रहेगी कि सपने मेहनत से पूरे तो हो सकते हैं, मगर जिंदगी की अनिश्चितता किसी भी पल सबसे बड़ी खुशी को सबसे बड़े दुख में बदल सकती है।

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