महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर सियासी भूचाल आ गया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के भीतर बढ़ती नाराजगी और सांसदों की कथित बगावत ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसी बीच राज्यसभा सांसद संजय राउत ने अपने ही पार्टी सांसदों पर ऐसा हमला बोला है, जिसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। राउत ने बागी सांसदों को “गद्दार”, “बेईमान”, “धोखेबाज” तक कह डाला और दावा किया कि उन्हें पार्टी छोड़ने के लिए करोड़ों रुपये का लालच दिया गया है। दिल्ली में आयोजित शिवसेना (यूबीटी) के संसदीय दल की बैठक में छह सांसदों की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक अटकलों को और हवा दे दी। बैठक में केवल कुछ चुनिंदा सांसद ही मौजूद रहे, जबकि छह सांसदों ने दूरी बनाए रखी। इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई कि ये सांसद जल्द ही एकनाथ शिंदे खेमे का रुख कर सकते हैं या किसी नए राजनीतिक समीकरण का हिस्सा बन सकते हैं। बैठक खत्म होते ही संजय राउत मीडिया के सामने आए और उन्होंने बागी सांसदों पर तीखा हमला बोल दिया। उन्होंने कहा कि जिन नेताओं को पार्टी ने पहचान दी, सांसद बनाया और जनता के बीच पहुंचाया, वही आज पार्टी की पीठ में छुरा घोंपने का काम कर रहे हैं। राउत ने कहा कि यह केवल राजनीतिक मतभेद नहीं बल्कि सीधा विश्वासघात है। राउत ने दावा किया कि बागी सांसदों को अतिरिक्त 10 करोड़ रुपये तक दिए गए और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया। हालांकि उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में कोई सार्वजनिक प्रमाण पेश नहीं किया, लेकिन उनके इस बयान ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि अगर इन सांसदों में जरा भी नैतिकता बची है तो उन्हें तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए और दोबारा जनता के बीच जाकर जनादेश लेना चाहिए।

संजय राउत का गुस्सा यहीं नहीं रुका। उन्होंने कहा कि ये सांसद अभी भी शिवसेना (यूबीटी) के टिकट और चुनाव चिन्ह पर जीतकर संसद पहुंचे हैं। ऐसे में पार्टी की पीठ में छुरा घोंपकर दूसरी तरफ जाने का नैतिक अधिकार उन्हें नहीं है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी और उनकी सदस्यता रद्द कराने तक की लड़ाई लड़ी जाएगी। राउत ने यह भी दावा किया कि जिन सांसदों ने पार्टी की बैठक से दूरी बनाई है, उनके खिलाफ जनता में भारी नाराजगी है। उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में इन नेताओं के लिए अपने ही चुनाव क्षेत्रों में जाना मुश्किल हो जाएगा। जनता सब कुछ देख रही है और समय आने पर जवाब भी देगी। राउत ने यहां तक कह दिया कि इन नेताओं को अपने क्षेत्रों में जाने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत पड़ सकती है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच संजय राउत ने सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग पर भी सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने कहा कि अगर पिछले कुछ वर्षों में शिवसेना से जुड़े मामलों पर समय रहते फैसला आ गया होता, तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती। राउत के मुताबिक देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम उसी का परिणाम है। शिवसेना (यूबीटी) सांसद अनिल देसाई ने भी संकेत दिए हैं कि पार्टी अब अनुशासनात्मक कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ेगी। बैठक में अनुपस्थित सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी करने की तैयारी की जा रही है। उनसे पूछा जाएगा कि आखिर उन्होंने पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक से दूरी क्यों बनाई। पार्टी नेतृत्व इस जवाब के आधार पर आगे का फैसला करेगा।
उधर दूसरी तरफ राजनीतिक घटनाक्रम ने नया मोड़ तब ले लिया, जब इन छह सांसदों की सुरक्षा बढ़ाने का फैसला सामने आया। महाराष्ट्र गृह विभाग ने सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर इन नेताओं को वाई-प्लस श्रेणी की सुरक्षा देने के निर्देश जारी किए हैं। बताया जा रहा है कि कुछ सांसदों को संभावित खतरे की आशंका को देखते हुए यह कदम उठाया गया है। सुरक्षा बढ़ाए जाने के बाद राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं। विपक्ष इसे राजनीतिक संरक्षण बता रहा है, जबकि संबंधित सांसदों के समर्थक इसे सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक कदम बता रहे हैं। हालांकि अभी तक इन सांसदों ने सार्वजनिक रूप से किसी नए राजनीतिक कदम की औपचारिक घोषणा नहीं की है। इस बीच संजय राउत लगातार आक्रामक तेवर दिखा रहे हैं। उन्होंने साफ संदेश दिया है कि पार्टी अब चुप बैठने वाली नहीं है। उनका कहना है कि शिवसेना के नाम, विचारधारा और कार्यकर्ताओं के बल पर राजनीति करने वाले नेताओं को पार्टी से विश्वासघात की कीमत चुकानी होगी। राउत ने कहा कि यह सिर्फ राजनीतिक लड़ाई नहीं बल्कि शिवसेना की अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई है।महाराष्ट्र की राजनीति में चल रहे इस सियासी संग्राम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि शिवसेना की अंदरूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। एक तरफ उद्धव ठाकरे गुट अपने सांसदों को एकजुट रखने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ बगावत की अटकलें लगातार तेज हो रही हैं। आने वाले दिनों में कारण बताओ नोटिस, संभावित कानूनी कार्रवाई और सांसदों के अगले कदम इस पूरे राजनीतिक ड्रामे की दिशा तय करेंगे। फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में आरोप, पलटवार, बगावत और शक्ति प्रदर्शन का दौर चरम पर पहुंच चुका है और सभी की नजरें अब इस सियासी जंग के अगले अध्याय पर टिकी हैं।
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