
करीब चार महीने तक चली भीषण सैन्य टकराव, तेल बाजार में उथल-पुथल, अरबों डॉलर के नुकसान और हजारों जिंदगियों पर पड़े असर के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान ने युद्धविराम की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए 60 दिनों के अंतरिम समझौते पर सहमति बना ली है। इस समझौते ने न केवल पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को अस्थायी विराम दिया है, बल्कि पूरी दुनिया को राहत की सांस लेने का मौका भी दिया है। हालांकि इस डील ने कई नए सवाल भी खड़े कर दिए हैं कि आखिर इस संघर्ष में किसने क्या हासिल किया और किसे सबसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। युद्ध की शुरुआत ऐसे हालात में हुई थी जब अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव को खत्म करने के लिए आक्रामक रणनीति पर आगे बढ़ रहे थे। जवाब में ईरान ने भी अपने सबसे बड़े हथियार—होर्मुज जलडमरूमध्य—का इस्तेमाल किया। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होती है। जैसे ही यह रास्ता बंद हुआ, वैश्विक अर्थव्यवस्था में भूचाल आ गया। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया, पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ, खाद्य पदार्थों की लागत बढ़ी और कई देशों में महंगाई नियंत्रण से बाहर होने लगी।अब हुए अंतरिम समझौते के तहत सबसे बड़ा और तत्काल प्रभाव होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने के रूप में सामने आया है। समुद्री व्यापार सामान्य होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव कम होगा और ऊर्जा संकट से जूझ रहे देशों को राहत मिलेगी। अमेरिका में भी बढ़ती महंगाई और राजनीतिक दबाव कम होने की उम्मीद है। यही वजह है कि इस समझौते को केवल दो देशों के बीच की डील नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस समझौते का सबसे बड़ा लाभार्थी फिलहाल ईरान दिखाई दे रहा है। लंबे समय से कड़े आर्थिक प्रतिबंधों और नाकेबंदी का सामना कर रहे ईरान को अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में खुलकर तेल बेचने का अवसर मिलेगा। अमेरिकी प्रतिबंध हटने के बाद ईरानी तेल उद्योग को नई जिंदगी मिलने की उम्मीद है। वर्षों से सीमित खरीदारों और गुप्त आपूर्ति नेटवर्क पर निर्भर रहने वाला ईरान अब वैश्विक बाजार में बेहतर कीमतों पर तेल बेच सकेगा। इससे उसकी अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर का नया प्रवाह होगा और युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई में मदद मिलेगी।

युद्ध के दौरान ईरान को भारी सैन्य और राजनीतिक झटके भी लगे। अमेरिकी और इजरायली हमलों में उसके कई सामरिक ठिकाने तबाह हुए, मिसाइल भंडार को नुकसान पहुंचा और शीर्ष नेतृत्व को भी बड़ा आघात लगा। लेकिन इसके बावजूद ईरानी शासन व्यवस्था पूरी तरह नहीं टूटी। यही कारण है कि तेहरान इस समझौते को अपनी रणनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहा है। ईरान का दावा है कि भारी सैन्य दबाव और आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद वह सत्ता परिवर्तन की कोशिशों को विफल करने में सफल रहा। समझौते के तहत ईरान को केवल तेल निर्यात की आजादी ही नहीं मिली, बल्कि भविष्य में सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटाने की संभावना भी खुल गई है। यदि आगामी परमाणु वार्ताएं सफल रहती हैं तो ईरान को व्यापक आर्थिक राहत मिल सकती है। इसके अलावा युद्ध के बाद पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर का विशाल फंड प्रस्तावित किया गया है। विदेशों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों की वापसी भी तेहरान के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।दूसरी तरफ अमेरिका को इस युद्ध में मिश्रित परिणाम मिले हैं। सैन्य दृष्टि से अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ईरान की पारंपरिक सैन्य क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचाया। कई मिसाइल ठिकानों, सैन्य अड्डों और रक्षा ढांचे को तबाह कर दिया गया। ईरान की नौसेना और वायुसेना को भी भारी क्षति पहुंची। अमेरिकी रणनीतिकार इसे अपनी बड़ी सैन्य सफलता बता रहे हैं। लेकिन युद्ध का दूसरा पक्ष अमेरिका के लिए उतना उत्साहजनक नहीं रहा। इस संघर्ष की आर्थिक कीमत बेहद भारी साबित हुई। अरबों डॉलर के सैन्य खर्च, वैश्विक व्यापार में बाधा और तेल बाजार में उथल-पुथल ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया। कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध का खर्च और उसके परिणामों के बीच संतुलन अमेरिका के पक्ष में पूरी तरह नहीं रहा।
सबसे बड़ा झटका यह रहा कि अमेरिका अपने प्रमुख राजनीतिक उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सका। ईरान में शासन परिवर्तन की रणनीति सफल नहीं हुई। तेहरान का सत्ता ढांचा कायम रहा और ईरान समर्थित क्षेत्रीय नेटवर्क भी पूरी तरह खत्म नहीं किए जा सके। हिजबुल्ला, हूती और अन्य सहयोगी समूह अब भी सक्रिय हैं। यही कारण है कि कई अमेरिकी विश्लेषक इस युद्ध को अधूरी जीत और महंगे समझौते के रूप में देख रहे हैं।परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा भी पूरी तरह हल नहीं हो पाया है। अमेरिका चाहता था कि ईरान की परमाणु क्षमता को स्थायी रूप से समाप्त कर दिया जाए, लेकिन अंतरिम समझौते में इस विषय को अंतिम समाधान के बजाय भविष्य की वार्ताओं के लिए छोड़ दिया गया है। इसका मतलब है कि आने वाले 60 दिन इस पूरे समझौते की सफलता या विफलता तय करेंगे। स्थिति को और जटिल बनाने वाला एक बड़ा मुद्दा लेबनान में जारी संघर्ष है। समझौते में शांति और क्षेत्रीय स्थिरता की बात तो की गई है, लेकिन इजरायल और हिजबुल्ला इस डील का प्रत्यक्ष हिस्सा नहीं हैं। यदि दक्षिणी लेबनान में लड़ाई जारी रहती है तो पूरा समझौता खतरे में पड़ सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ इस युद्धविराम को स्थायी शांति नहीं बल्कि बेहद नाजुक और अस्थायी व्यवस्था मान रहे हैं।इस पूरी प्रक्रिया का एक और महत्वपूर्ण पहलू अमेरिका और इजरायल के रिश्तों में आई खटास है। इजरायल को बातचीत की मुख्य प्रक्रिया से दूर रखे जाने के कारण वहां राजनीतिक असंतोष बढ़ा है। अमेरिकी नेतृत्व और इजरायली सरकार के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं। इससे पश्चिम एशिया की राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावना भी बढ़ गई है।फिलहाल दुनिया की निगाहें अगले 60 दिनों पर टिकी हैं। यदि परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों पर अंतिम सहमति बन जाती है तो यह समझौता पश्चिम एशिया में लंबे समय की स्थिरता का आधार बन सकता है। लेकिन यदि वार्ताएं विफल होती हैं या लेबनान और अन्य मोर्चों पर तनाव बढ़ता है, तो यह शांति समझौता भी इतिहास के उन अस्थायी विरामों में शामिल हो सकता है, जिनके बाद संघर्ष पहले से अधिक भयावह रूप में लौटे हैं। अभी के लिए इतना तय है कि युद्ध की आग भले धीमी पड़ गई हो, लेकिन उसके अंगारे अभी पूरी तरह ठंडे नहीं हुए हैं।
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