उज्जैन में खड़े हनुमान की प्रतिमा नहीं हिली, 4 प्रयास नाकाम

Editorial
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उज्जैन उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण के बीच अति प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा को हटाने की कोशिश अब बड़ा विवाद बन गई है। प्रशासन की ओर से प्रतिमा को विस्थापित करने के लिए कई प्रयास किए जा चुके हैं, लेकिन प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हिली। लगातार कोशिशों के बावजूद सफलता नहीं मिलने से जहां प्रशासन के सामने तकनीकी चुनौती खड़ी हो गई है, वहीं मंदिर परिसर के बाहर साधु-संतों और श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती जा रही है।श्रद्धालु इसे भगवान हनुमान की इच्छा और चमत्कार से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं पुरातत्वविदों का कहना है कि प्रतिमा की संरचना और उसे स्थापित करने की प्राचीन तकनीक को समझे बिना उसे हटाने का प्रयास करना उचित नहीं होगा। अब प्रशासन ने विशेषज्ञों की मदद से प्रतिमा की स्कैनिंग कराने का फैसला किया है।

उज्जैन में खड़े हनुमान की प्रतिमा नहीं हिली
उज्जैन में खड़े हनुमान की प्रतिमा नहीं हिली

चार बार प्रयास, फिर भी टस से मस नहीं हुई प्रतिमा

कंठाल चौराहा से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण का काम प्रस्तावित है। इसी परियोजना की जद में प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर का हिस्सा भी आ रहा है।प्रतिमा को दूसरी जगह सुरक्षित रूप से स्थापित करने के लिए प्रशासन की ओर से प्रयास किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कई दिनों में चार बार प्रतिमा को हटाने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार प्रयास सफल नहीं हो सका।मंदिर का गर्भगृह और मुख्य ढांचा हटाया जा चुका है, जबकि प्रतिमा को फिलहाल कैनोपी लगाकर सुरक्षित रखा गया है। प्रतिमा को लेकर स्थानीय श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है और इसी वजह से प्रशासन की कार्रवाई को लेकर विरोध भी देखने को मिल रहा है।

संत बोले- बाबा खुद नहीं जाना चाहते!

प्रतिमा के विस्थापन को लेकर साधु-संत और हिंदू संगठनों के लोग मंदिर के बाहर जुट रहे हैं। उनका कहना है कि अगर बार-बार प्रयास के बावजूद प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हट रही है तो प्रशासन को इसे केवल तकनीकी समस्या के रूप में नहीं देखना चाहिए।मंदिर के सेवादार और पुजारी महेश पंडित बैरागी का कहना है कि उन्हें लगातार ऐसा महसूस हो रहा है कि बाबा संकेत दे रहे हैं कि वे इसी स्थान पर रहना चाहते हैं।कुछ संतों और श्रद्धालुओं ने प्रतिमा के नहीं हिलने को चमत्कार तक बताया है। हालांकि, यह धार्मिक आस्था और मान्यता का विषय है, जबकि प्रतिमा के न हिलने के तकनीकी कारणों की पुष्टि विशेषज्ञों की जांच के बाद ही हो सकेगी।

पुरातत्वविद् ने बताई प्रतिमा की खासियत

विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार, खड़े हनुमान की यह प्रतिमा सामान्य प्रतिमाओं से अलग और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती है।उनके मुताबिक प्रतिमा मालवा क्षेत्र के विशेष बेसाल्ट पत्थर से बनी है और इसमें परमार काल तथा राजा भोज के दौर की शिल्प परंपरा दिखाई देती है।पुरातत्वविद् का कहना है कि प्राचीन समय में मंदिरों और प्रतिमाओं को स्थापित करने के लिए ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता था, जिनमें पत्थरों को आपस में विशेष तरीके से जोड़ा जाता था। ऐसे में संभव है कि प्रतिमा अपने आधार के साथ किसी विशेष संरचनात्मक व्यवस्था में जुड़ी हो।यही वजह है कि इसे हटाने से पहले इसकी पूरी संरचना को समझना जरूरी है।

प्रशासन को मिला विशेषज्ञों से सलाह लेने का सुझाव

डॉ. रमण सोलंकी ने सुझाव दिया है कि प्रतिमा को विस्थापित या पुनर्स्थापित करने से पहले मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के विशेषज्ञों से सलाह ली जानी चाहिए।उनका कहना है कि इन संस्थाओं के पास प्राचीन मंदिरों और प्रतिमाओं के संरक्षण एवं पुनर्स्थापना का अनुभव है। विशेषज्ञों की देखरेख में प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से हटाने या पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया तय की जा सकती है।इस सुझाव के बाद अब प्रशासन भी जल्दबाजी के बजाय तकनीकी विशेषज्ञों की मदद लेने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

स्कैनिंग रिपोर्ट खोलेगी प्रतिमा के रहस्य

प्रशासन की अगली योजना प्रतिमा के आधार और आसपास की संरचना की तकनीकी जांच कराने की है। इसके लिए आर्कियोलॉजिस्ट की टीम अत्याधुनिक मशीनों से प्रतिमा के नीचे के हिस्से, आंतरिक संरचना और आसपास की मिट्टी की स्कैनिंग करेगी।प्रतिमा के आधार की स्थिति जानने के लिए नीचे लगभग डेढ़ फीट गहराई तक गड्ढा भी खोदा गया है। अब स्कैनिंग रिपोर्ट आने के बाद ही यह तय किया जाएगा कि प्रतिमा को किस तकनीक से सुरक्षित रूप से विस्थापित किया जा सकता है।इस प्रक्रिया का उद्देश्य प्रतिमा को नुकसान पहुंचाए बिना आगे की कार्रवाई करना है।

सड़क चौड़ीकरण बना विवाद की वजह

दरअसल उज्जैन में सिंहस्थ-2028 की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न विकास कार्यों पर जोर दिया जा रहा है। इसी क्रम में कंठाल चौराहा से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण की योजना पर काम हो रहा है।इसी सड़क परियोजना की जद में प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर का ढांचा आ रहा है। प्रशासन की योजना प्रतिमा को सुरक्षित स्थान पर स्थापित करने की है, जबकि स्थानीय श्रद्धालु और संत चाहते हैं कि मंदिर को उसी स्थान पर दोबारा बनाया जाए।स्थानीय लोगों का दावा है कि इस मंदिर का इतिहास 1857 की क्रांति से भी पहले का है। इसी ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण लोग मंदिर को केवल धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि स्थानीय विरासत का हिस्सा भी मानते हैं।

मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की बढ़ी भीड़

प्रतिमा हटाने की कोशिशों की खबर फैलने के बाद श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ रही है। लोग मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं और प्रतिमा से जुड़े अपने अनुभव साझा कर रहे हैं।मंदिर के बाहर एक पोस्टर भी लगाया गया है, जिसमें चेतावनी दी गई है कि प्रतिमा को हटाते समय अगर उसे किसी तरह का नुकसान होता है तो इसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।इससे साफ है कि मामला अब केवल सड़क चौड़ीकरण तक सीमित नहीं रहा है। इसमें धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत और प्रशासनिक विकास योजना तीनों पहलू जुड़ गए हैं।

अब विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर टिकी नजर

उज्जैन के खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा को लेकर पैदा हुआ विवाद फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा। एक तरफ प्रशासन के सामने सड़क चौड़ीकरण और विकास कार्य की चुनौती है, तो दूसरी तरफ श्रद्धालु प्राचीन प्रतिमा को उसी स्थान पर बनाए रखने की मांग कर रहे हैं।चार प्रयासों के बाद भी प्रतिमा के नहीं हटने ने मामले को और चर्चा में ला दिया है। श्रद्धालु इसे आस्था से जोड़ रहे हैं, जबकि विशेषज्ञ इसकी संरचना और प्राचीन तकनीक के आधार पर वैज्ञानिक कारण तलाशने की बात कर रहे हैं।अब सबसे ज्यादा नजर स्कैनिंग रिपोर्ट और पुरातत्व विशेषज्ञों की सलाह पर है। रिपोर्ट के आधार पर ही तय होगा कि प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित किया जा सकता है या फिर मंदिर को इसी स्थान पर संरक्षित करने का कोई विकल्प निकाला जाएगा।फिलहाल उज्जैन में खड़े हनुमान की प्रतिमा को लेकर एक ही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है—क्या प्राचीन आस्था और आधुनिक विकास के बीच ऐसा रास्ता निकलेगा, जिसमें सड़क भी बने और ऐतिहासिक विरासत भी सुरक्षित रहे?

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