लखनऊ उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में सरकारी नौकरियों की भर्ती में एक बहुत बड़े भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। इस बार एक्सरे टेक्नीशियन और लैब टेक्नीशियन भर्ती की पुरानी तर्ज पर ही ‘डॉर्क रूम सहायक’ की भर्ती में भी बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा किए जाने की बात सामने आई है। इस पूरे घोटाले में स्वास्थ्य महानिदेशालय से लेकर संबंधित जिलों के मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) कार्यालय तक के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत का गहरा अंदेशा जताया जा रहा है। जैसे ही सोमवार को इस फर्जीवाड़े की खबर मीडिया के माध्यम से उजागर हुई, विभाग में हड़कंप मच गया और आजमगढ़, अमेठी, इटावा, हरदोई समेत कई जिलों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर फर्जी नियुक्ति पत्रों के सहारे तैनात कई डॉर्क रूम सहायक सोमवार दोपहर बाद अचानक अस्पताल छोड़कर गायब हो गए। इनमें से कई तो सुबह बिना कोई छुट्टी लिए ही ड्यूटी से भाग खड़े हुए और जब उनसे फोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई, तो वे जवाब देने से बचते नजर आए और थोड़ी ही देर में उन्होंने अपने मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ कर लिए। इसके विपरीत, जिन असली चयनित अभ्यर्थियों के नाम सूची में शामिल थे, वे अस्पतालों में मुस्तैद रहे और उन्होंने अपना मेरिट क्रमांक बताते हुए इस पूरे मामले का भंडाफोड़ करने के लिए आभार भी जताया। जांच में यह अंदेशा जताया जा रहा है कि इस फर्जीवाड़े को अंजाम देने के पीछे वही पुराना संगठित गैंग सक्रिय है, जिसने साल 2007 में लैब टेक्नीशियन और 2008 व 2016 में एक्सरे टेक्नीशियन भर्ती में घोटाला किया था, जहां एक ही चयनित अभ्यर्थी के नाम पर चार से पांच लोगों को फर्जी नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए थे। यह गैंग महानिदेशालय से लेकर जिला स्तर के दफ्तरों तक इतना मजबूत है कि उसने न सिर्फ फर्जी नियुक्ति पत्र जारी करवाए और ज्वाइनिंग दिलवाई, बल्कि कार्यभार ग्रहण करने के बाद सीएमओ दफ्तर से महानिदेशालय भेजे जाने वाले अनिवार्य सत्यापन (वेरिफिकेशन) प्रमाण पत्र को भी बीच में ही रुकवा दिया, ताकि इस पूरे फर्जीवाड़े की पोल कभी खुल न सके। आंकड़ों के मुताबिक, डॉर्क रूम सहायक की इस विवादास्पद सूची में सबसे ज्यादा 48 अभ्यर्थियों का गृह क्षेत्र लखनऊ दर्ज है, जबकि 21 का पता इटावा है (जिसमें 13 लोग अकेले सैफई के हैं) और 9 लोग मैनपुरी के हैं, जबकि बाकी जिलों से तीन से पांच लोगों के नाम शामिल हैं।

इस पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही और सुस्ती भी उजागर हुई है, क्योंकि एक ही नाम से दो से तीन लोगों के अलग-अलग जिलों में ज्वाइन करने पर जब असली अभ्यर्थियों ने शिकायत की थी, तब जिला स्तर पर हुई जांच में सात फर्जी कर्मचारियों को पूर्व में ही बर्खास्त किया जा चुका था और एक ने डर के मारे खुद ही इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफा देने वाले का नाम शोभाराम चौधरी था, जबकि बर्खास्त होने वालों में हरदोई से अवधेश कुमार, प्रयागराज से दिलीप सिंह, बदायूं से गिर्राज सिंह, कासगंज से जगदीश प्रसाद, गाजियाबाद से राहुल कुमार, औरैया से राजेश कुमार और सिद्धार्थनगर से रीमा चौधरी शामिल थीं। इतने बड़े सुराग मिलने के बावजूद विभाग के आला अफसरों ने पूरी सूची और ज्वाइन करने वाले कर्मचारियों का मिलान करने के बजाय लंबे समय तक इस गंभीर मामले को दबाए रखा। अब मामला तूल पकड़ने पर उत्तर प्रदेश सरकार पूरी तरह सख्त नजर आ रही है। अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वास्थ्य महानिदेशक को पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच के सख्त निर्देश दिए हैं। वहीं, स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. पवन कुमार अरुण ने बताया कि इस मामले से जुड़ी सभी पुरानी पत्रावलियां और फाइलें निकलवा ली गई हैं, कुछ आरोपियों पर पहले ही रिपोर्ट दर्ज की जा चुकी है और अब इस पूरे रैकेट की तह तक जाने के लिए एक व्यापक व विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है जिसके आधार पर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
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