लखनऊ उत्तर प्रदेश में एक ऐसा संक्रमण तेजी से पैर पसार रहा है, जो बिना शोर किए लोगों के शरीर के सबसे अहम अंग लिवर को धीरे-धीरे बर्बाद कर रहा है। यह बीमारी है हेपेटाइटिस, जिसे डॉक्टर “साइलेंट किलर” भी कहते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि प्रदेश में अब इस बीमारी का भूगोल बदल रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां हेपेटाइटिस-बी और सी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, वहीं पूर्वांचल और तराई के जिलों में हेपेटाइटिस-ए और ई का संक्रमण मानसून के दौरान दूषित पानी के जरिए तेजी से फैल रहा है।विश्व हेपेटाइटिस दिवस पर सामने आए स्वास्थ्य आंकड़े बताते हैं कि यदि समय रहते इस बीमारी पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश में लिवर रोगों का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
- पश्चिमी यूपी बना संक्रमण का बड़ा हॉटस्पॉट
- पूर्वांचल में दूषित पानी बन रहा सबसे बड़ा खतरा
- सबसे बड़ी चिंता—बीमारी का देर से पता चलना
- युवा सबसे ज्यादा चपेट में
- बचपन में ही संक्रमण के संपर्क में आ रहे बच्चे
- मेरठ बना इलाज का सबसे बड़ा केंद्र
- झोलाछाप और संक्रमित ब्लेड बन रहे सबसे बड़े कारण
- 2030 तक खत्म करने का लक्ष्य, लेकिन राह आसान नहीं
- कैसे करें बचाव?
पश्चिमी यूपी बना संक्रमण का बड़ा हॉटस्पॉट
राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम और विभिन्न स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कुल हेपेटाइटिस-बी और सी मरीजों में लगभग 39 प्रतिशत मरीज केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 18 जिलों से हैं।मेरठ, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, गाजियाबाद और आसपास के जिलों में संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि असुरक्षित इंजेक्शन, संक्रमित ब्लेड, बिना जांच के रक्त चढ़ाना और संक्रमण नियंत्रण के नियमों की अनदेखी इसकी बड़ी वजह बन रही है।
पूर्वांचल में दूषित पानी बन रहा सबसे बड़ा खतरा
दूसरी ओर आईसीएमआर के अध्ययन ने पूर्वांचल और तराई के जिलों को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। मानसून के दौरान जलभराव, सीवेज मिश्रित पानी और दूषित पेयजल के कारण हेपेटाइटिस-ए और ई तेजी से फैल रहे हैं।बहराइच, श्रावस्ती, लखीमपुर खीरी, महराजगंज और गोरखपुर जैसे जिलों में बाढ़ और जलभराव के बाद संक्रमण के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।विशेषज्ञों का कहना है कि जहां स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है, वहां यह संक्रमण तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है।

सबसे बड़ी चिंता—बीमारी का देर से पता चलना
डॉक्टरों के अनुसार हेपेटाइटिस की सबसे खतरनाक बात यह है कि शुरुआती दौर में इसके लक्षण बेहद सामान्य होते हैं या कई बार दिखाई ही नहीं देते।कई मरीजों को तब पता चलता है जब उनका लिवर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुका होता है और बीमारी लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर तक पहुंच चुकी होती है।यही वजह है कि विशेषज्ञ नियमित जांच कराने पर सबसे अधिक जोर दे रहे हैं।
युवा सबसे ज्यादा चपेट में
रिपोर्ट के अनुसार संक्रमित मरीजों में 54 प्रतिशत पुरुष और 46 प्रतिशत महिलाएं हैं।सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 21 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के युवा सबसे अधिक संक्रमित पाए जा रहे हैं। यानी प्रदेश की सबसे अधिक कामकाजी और उत्पादक आबादी इस बीमारी की चपेट में आ रही है।विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो इसका असर केवल स्वास्थ्य पर ही नहीं बल्कि आर्थिक उत्पादकता पर भी पड़ सकता है।
बचपन में ही संक्रमण के संपर्क में आ रहे बच्चे
गोंडा, बलरामपुर, मऊ, उन्नाव, औरैया और बरेली सहित नौ जिलों से लिए गए 1,957 रक्त नमूनों की जांच में 97 प्रतिशत लोगों में हेपेटाइटिस-ए के खिलाफ एंटीबॉडी पाई गई।इसका अर्थ यह है कि प्रदेश की बड़ी आबादी बचपन में ही इस संक्रमण के संपर्क में आ चुकी है। यह स्थिति साफ-सफाई और पेयजल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
मेरठ बना इलाज का सबसे बड़ा केंद्र
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज, मेरठ हेपेटाइटिस के इलाज का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है।यहां 22 हजार से अधिक हेपेटाइटिस-सी मरीज पंजीकृत हैं।वहीं बिजनौर में लगभग 3,997 और मुजफ्फरनगर में 2,300 से अधिक हेपेटाइटिस-बी और सी के मरीज दर्ज किए जा चुके हैं।यह आंकड़े बताते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संक्रमण किस तेजी से फैल रहा है।
झोलाछाप और संक्रमित ब्लेड बन रहे सबसे बड़े कारण
विशेषज्ञों ने हेपेटाइटिस-बी और सी के फैलने के पीछे कई गंभीर कारण बताए हैं।
इनमें सबसे प्रमुख हैं—
- एक ही सिरिंज का बार-बार उपयोग
- संक्रमित ब्लेड और रेजर से शेविंग
- बिना संक्रमण नियंत्रण वाले ब्लड बैंक
- झोलाछाप चिकित्सकों द्वारा असुरक्षित इलाज
- संक्रमित चिकित्सा उपकरणों का दोबारा इस्तेमाल
अगस्त 2025 में सीतापुर के सोनसारी गांव में 400 लोगों की जांच के दौरान 95 लोग हेपेटाइटिस-बी और सी से संक्रमित मिले थे। जांच में असुरक्षित ब्लेड और संक्रमित उपकरणों को संभावित कारण माना गया था।
2030 तक खत्म करने का लक्ष्य, लेकिन राह आसान नहीं
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वर्ष 2030 तक हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरे के रूप में समाप्त करने का लक्ष्य तय किया है।भारत और उत्तर प्रदेश में भी इसके लिए राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिसके तहत मुफ्त जांच और दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।हालांकि अधिकांश जिलों में वायरल लोड (PCR) जांच की सीमित सुविधा आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जांच सुविधाओं का विस्तार किए बिना इस लक्ष्य को हासिल करना कठिन होगा।
कैसे करें बचाव?
गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. सुमित रुंगटा के अनुसार हेपेटाइटिस-बी और सी साथ खाना खाने, हाथ मिलाने, गले मिलने या खांसने से नहीं फैलता।
संक्रमण से बचाव के लिए ये सावधानियां बेहद जरूरी हैं—
- हमेशा सुरक्षित और जांचा हुआ रक्त ही चढ़वाएं।
- डिस्पोजेबल सिरिंज और नई सुई का ही उपयोग सुनिश्चित करें।
- सैलून में हमेशा नया ब्लेड इस्तेमाल कराएं।
- उबला या शुद्ध पानी पिएं।
- भोजन को ढककर रखें।
- खाने से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ धोएं।
- समय-समय पर हेपेटाइटिस की जांच कराएं।
- हेपेटाइटिस-बी का टीकाकरण जरूर करवाएं।
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