वॉशिंगटन अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को होने वाले मिडटर्म चुनाव ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक ताकत को लेकर नई बहस छेड़ दी है। चुनाव से पहले आए सर्वेक्षणों में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों में अपना बहुमत बचा पाएगी या फिर डेमोक्रेट्स की वापसी से वॉशिंगटन की सत्ता का समीकरण बदल जाएगा? यह चुनाव केवल सांसदों के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के अगले दो वर्षों की राजनीतिक दिशा भी तय कर सकता है।
- 3 नवंबर को होगा मिडटर्म चुनाव, कांग्रेस की सभी 435 सीटों पर मुकाबला
- ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग 32 प्रतिशत, डेमोक्रेट्स को सर्वे में बढ़त
- महंगाई, स्वास्थ्य सेवाएं और ईरान का मुद्दा बना चुनावी चर्चा का केंद्र
- प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स जीते तो ट्रंप के लिए क्या बदलेगा?
- सीनेट में बदलाव हुआ तो नियुक्तियों पर भी पड़ेगा असर
- मिडटर्म में हार से नहीं जाएगी ट्रंप की राष्ट्रपति की कुर्सी
- पूरी दुनिया की नजर अमेरिकी चुनाव के नतीजों पर


3 नवंबर को होगा मिडटर्म चुनाव, कांग्रेस की सभी 435 सीटों पर मुकाबला
अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हर चार साल में होता है, जबकि मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में आयोजित किए जाते हैं। इन चुनावों के जरिए अमेरिकी कांग्रेस के प्रतिनिधि सभा और सीनेट की संरचना तय होती है। इस बार प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों पर मतदान होना है। वहीं सीनेट की 35 सीटों के लिए भी चुनाव होगा, जिनमें नियमित चुनाव के साथ दो विशेष चुनाव शामिल हैं। रिपब्लिकन पार्टी का दोनों सदनों में बहुमत है। ऐसे में उसके सामने अपनी संसदीय ताकत बनाए रखने की चुनौती है। दूसरी ओर डेमोक्रेटिक पार्टी की कोशिश प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करने और सीनेट में अपनी स्थिति मजबूत करने की है। अगर डेमोक्रेट्स ऐसा करने में सफल रहे तो ट्रंप प्रशासन को अपने फैसलों और नीतियों पर पहले से ज्यादा राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।


ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग 32 प्रतिशत, डेमोक्रेट्स को सर्वे में बढ़त
चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता और मतदाताओं के रुझान पर भी सबकी नजर है। रॉयटर्स और इप्सोस के 26 अक्टूबर को जारी सर्वे के मुताबिक, ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग 32 प्रतिशत दर्ज की गई। यह आंकड़ा पिछले सप्ताह के रिकॉर्ड निचले स्तर से एक प्रतिशत अंक ऊपर था। कांग्रेस के चुनाव में किस पार्टी को वोट देंगे, इस सवाल पर पंजीकृत मतदाताओं के बीच डेमोक्रेट्स को 47 प्रतिशत और रिपब्लिकन को 36 प्रतिशत समर्थन मिला।इस सर्वे में डेमोक्रेटिक पार्टी को नौ प्रतिशत अंकों की बढ़त दिखाई दी। संभावित मतदाताओं के बीच भी डेमोक्रेट्स आगे रहे। हालांकि, सर्वेक्षण को चुनाव परिणाम नहीं माना जा सकता। स्थानीय उम्मीदवारों, चुनावी क्षेत्रों, मतदान प्रतिशत और आखिरी समय के राजनीतिक घटनाक्रम का असर वास्तविक नतीजों पर पड़ सकता है। फिर भी ये आंकड़े रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण चुनावी माहौल की ओर इशारा करते हैं।

महंगाई, स्वास्थ्य सेवाएं और ईरान का मुद्दा बना चुनावी चर्चा का केंद्र
इस चुनाव में ट्रंप प्रशासन के सामने केवल विपक्षी दलों की चुनौती नहीं है। अमेरिकी मतदाता रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दों पर भी सरकार का आकलन कर रहे हैं। महंगाई, घरेलू खर्च, पेट्रोल की कीमतें, स्वास्थ्य सेवाएं और विदेश नीति चुनावी चर्चा के प्रमुख विषय बन गए हैं।गैलप के 29 अक्टूबर को जारी सर्वेक्षण के अनुसार, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाएं मतदाताओं की सबसे अहम प्राथमिकताओं में शामिल हैं। सर्वे में 50 प्रतिशत पंजीकृत मतदाताओं ने अर्थव्यवस्था और इतने ही मतदाताओं ने स्वास्थ्य सेवाओं को अपने वोट के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। वहीं 47 प्रतिशत मतदाताओं ने ईरान की स्थिति को बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा माना। पेट्रोल की कीमतों को 42 प्रतिशत मतदाताओं ने इसी श्रेणी में रखा।इन आंकड़ों से साफ है कि मतदाता केवल राजनीतिक नारों या पार्टी के चुनावी वादों के आधार पर फैसला नहीं कर रहे, बल्कि वे अपनी आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य सेवाओं और अंतरराष्ट्रीय हालात को भी ध्यान में रख रहे हैं। पेट्रोल और रोजमर्रा की जरूरतों पर बढ़ता खर्च भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है।
प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स जीते तो ट्रंप के लिए क्या बदलेगा?
अगर डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लेती है तो ट्रंप प्रशासन के सामने संसदीय स्तर पर कई नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। प्रतिनिधि सभा में बहुमत रखने वाली पार्टी संसदीय समितियों पर प्रभाव रखती है। इसके जरिए वह सरकारी नीतियों की जांच, प्रशासनिक फैसलों पर सुनवाई और अधिकारियों से जवाब-तलब करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती है।डेमोक्रेट्स को बहुमत मिलने की स्थिति में ट्रंप प्रशासन के फैसलों की जांच के लिए संसदीय समितियों की सक्रियता बढ़ सकती है। बजट, सरकारी खर्च और नई नीतियों से जुड़े प्रस्तावों पर भी विपक्ष ज्यादा प्रभावी तरीके से सवाल उठा सकेगा। ऐसे में राष्ट्रपति प्रशासन के लिए अपने एजेंडे को कांग्रेस से मंजूरी दिलाना आसान नहीं रहेगा।इसका अर्थ यह नहीं होगा कि ट्रंप के सभी फैसले रुक जाएंगे। राष्ट्रपति के पास संवैधानिक अधिकार बने रहेंगे। लेकिन कांग्रेस में विपक्ष का बहुमत होने पर सरकार को कानून बनाने और वित्तीय प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए ज्यादा राजनीतिक बातचीत और समझौते की जरूरत पड़ सकती है।
सीनेट में बदलाव हुआ तो नियुक्तियों पर भी पड़ेगा असर
सीनेट की भूमिका भी इस चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण है। अमेरिकी व्यवस्था में राष्ट्रपति कई वरिष्ठ प्रशासनिक और न्यायिक पदों पर नियुक्तियां करते हैं, लेकिन अनेक महत्वपूर्ण नियुक्तियों को सीनेट की मंजूरी की आवश्यकता होती है। यदि सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी अपना बहुमत खो देती है तो ट्रंप प्रशासन के लिए इन नियुक्तियों को मंजूरी दिलाना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।इसके अलावा सीनेट में बहुमत का असर राष्ट्रपति के विधायी एजेंडे और अंतरराष्ट्रीय समझौतों से जुड़े मामलों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, सीनेट में डेमोक्रेट्स की जीत के लिए उन्हें कई सीटों पर चुनावी सफलता हासिल करनी होगी। इसलिए प्रतिनिधि सभा की तुलना में सीनेट का मुकाबला अलग और अधिक जटिल माना जा रहा है।
मिडटर्म में हार से नहीं जाएगी ट्रंप की राष्ट्रपति की कुर्सी
इस चुनाव को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू समझना जरूरी है। मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार का मतलब यह नहीं होगा कि डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति का कार्यकाल तय संवैधानिक अवधि के अनुसार जारी रहेगा। कांग्रेस में बहुमत बदलने से राष्ट्रपति की कुर्सी अपने आप नहीं जाती।राष्ट्रपति के पास वीटो जैसे संवैधानिक अधिकार भी बने रहेंगे। हालांकि, यदि कांग्रेस के दोनों सदनों में विपक्ष मजबूत हो जाता है तो सरकार के लिए कानून पारित कराना और बजट से जुड़े फैसले आगे बढ़ाना कठिन हो सकता है। यानी ट्रंप राष्ट्रपति बने रहेंगे, लेकिन उनकी राजनीतिक और विधायी ताकत पर अंकुश लग सकता है।
पूरी दुनिया की नजर अमेरिकी चुनाव के नतीजों पर
अमेरिका की राजनीति का असर केवल उसके घरेलू मामलों तक सीमित नहीं रहता। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल अमेरिका की नीतियां अंतरराष्ट्रीय व्यापार, सुरक्षा, कूटनीति और वैश्विक बाजारों को प्रभावित करती हैं। ऐसे में कांग्रेस में बहुमत का समीकरण बदलने से ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो सकती है।ईरान, मध्य पूर्व, ऊर्जा कीमतों और दूसरे देशों के साथ अमेरिका के संबंधों पर कांग्रेस में होने वाली चर्चा का असर प्रशासन की नीतियों पर पड़ सकता है। हालांकि, विदेश नीति से जुड़े कई फैसलों में राष्ट्रपति की महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहती है। इसलिए चुनाव के बाद संभावित बदलावों को समझने के लिए कांग्रेस के नए समीकरण के साथ राष्ट्रपति के अधिकारों को भी ध्यान में रखना होगा।3 नवंबर के मतदान का इंतजार है। एक तरफ रिपब्लिकन पार्टी अपनी संसदीय पकड़ बचाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ डेमोक्रेट्स के सामने कांग्रेस में वापसी का मौका है। सर्वेक्षणों में डेमोक्रेट्स की बढ़त ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है, लेकिन अंतिम फैसला मतदाता ही करेंगे। अब देखना होगा कि अमेरिकी जनता ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर भरोसा जताती है या कांग्रेस में विपक्ष को मजबूत कर सत्ता के समीकरण में बदलाव का रास्ता खोलती है।
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