आज के समय में शेविंग या वैक्सिंग महिलाओं की ग्रूमिंग रूटीन का एक सामान्य हिस्सा मानी जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि महिलाओं ने शरीर के बाल हटाना आखिर कब शुरू किया? क्या यह आधुनिक फैशन का हिस्सा है या इसकी जड़ें हजारों साल पुराने इतिहास में छिपी हैं?दिलचस्प बात यह है कि महिलाओं द्वारा शरीर के बाल हटाने की परंपरा नई नहीं है। इसका इतिहास प्राचीन मिस्र, यूनान और रोम की सभ्यताओं तक पहुंचता है। हालांकि इसे दुनिया भर में लोकप्रिय बनाने का श्रेय काफी हद तक 20वीं सदी की मार्केटिंग रणनीतियों और बदलते फैशन ट्रेंड्स को जाता है। आइए जानते हैं महिलाओं की शेविंग और हेयर रिमूवल का पूरा इतिहास।
प्राचीन मिस्र में सुंदरता का प्रतीक था बाल रहित शरीर
इतिहासकारों के अनुसार, लगभग 3000 ईसा पूर्व के प्राचीन मिस्र में पुरुष और महिलाएं दोनों शरीर के अनचाहे बाल हटाते थे। उस समय साफ-सुथरा और बाल रहित शरीर सुंदरता, स्वच्छता और उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था।मिस्र की महिलाएं मधुमक्खी के मोम, शहद और चीनी से बने प्राकृतिक मिश्रण का उपयोग करती थीं। यह तकनीक आज के “शुगर वैक्स” जैसी ही थी। कुछ लोग तेज धार वाले पत्थरों और तांबे या कांसे के बने रेजर का भी इस्तेमाल करते थे।

यूनान और रोम में भी था चलन
प्राचीन यूनान और रोमन सभ्यताओं में भी महिलाओं के लिए चिकनी त्वचा सुंदरता का महत्वपूर्ण मानक मानी जाती थी।रोमन महिलाएं प्यूमिस स्टोन (झांवा पत्थर), चिमटी और प्राकृतिक रसायनों की मदद से बाल हटाती थीं। उस समय शरीर के अधिक बालों को असभ्यता और निम्न वर्ग से जोड़कर देखा जाता था।
मध्यकाल में बदली सोच
यूरोप के मध्यकाल में महिलाओं के शरीर के बालों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था। उस समय पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहने जाते थे, इसलिए हाथ-पैर या शरीर के अन्य हिस्सों के बाल सामाजिक चर्चा का विषय नहीं बनते थे।हालांकि माथे को बड़ा और आकर्षक दिखाने के लिए महिलाएं हेयरलाइन के पास के बाल हटाती थीं।
19वीं सदी तक शेविंग सिर्फ पुरुषों तक सीमित रही
औद्योगिक क्रांति के बाद रेजर का उत्पादन बढ़ा, लेकिन उनका इस्तेमाल मुख्य रूप से पुरुषों की दाढ़ी बनाने तक ही सीमित था।महिलाओं के लिए अलग से शेविंग उत्पाद उपलब्ध नहीं थे क्योंकि उस समय महिलाओं के शरीर के बाल सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं माने जाते थे।
1900 के दशक में आया बड़ा बदलाव
20वीं सदी की शुरुआत में फैशन तेजी से बदलने लगा। बिना बाजू वाले गाउन और छोटे कपड़ों का चलन शुरू हुआ। अब महिलाओं के अंडरआर्म दिखाई देने लगे।यहीं से कॉस्मेटिक कंपनियों ने एक नया बाजार देखा।
1915 में लॉन्च हुआ पहला महिला रेजर
साल 1915 में अमेरिका की कंपनी जिलेट (Gillette) ने महिलाओं के लिए पहला विशेष रेजर लॉन्च किया।इसके साथ ही बड़े पैमाने पर विज्ञापन अभियान शुरू किया गया। विज्ञापनों में महिलाओं को बताया गया कि शरीर के बाल “अनाकर्षक” हैं और आधुनिक महिला को इन्हें हटाना चाहिए।यहीं से शेविंग को महिलाओं की ग्रूमिंग का आवश्यक हिस्सा बनाने की शुरुआत हुई।
मार्केटिंग ने बदली सोच
इतिहासकार मानते हैं कि महिलाओं में शेविंग की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण सामाजिक दबाव से ज्यादा विज्ञापन थे।कॉस्मेटिक कंपनियों ने पत्रिकाओं और अखबारों में ऐसे विज्ञापन प्रकाशित किए जिनमें साफ त्वचा को आधुनिकता, सुंदरता और आत्मविश्वास का प्रतीक बताया गया।धीरे-धीरे यह धारणा समाज में स्थापित होती चली गई।
द्वितीय विश्व युद्ध ने बढ़ाई लोकप्रियता
सेकंड वर्ल्ड वॉर (1939–1945) के दौरान नायलॉन की भारी कमी हो गई क्योंकि इसका उपयोग सेना के लिए किया जा रहा था।उस समय महिलाएं स्कर्ट पहनती थीं और बिना स्टॉकिंग के पैरों पर बाल अधिक दिखाई देते थे। ऐसे में पैरों की शेविंग तेजी से लोकप्रिय हो गई।युद्ध समाप्त होने के बाद भी यह आदत बनी रही और दुनिया के कई देशों में सामान्य ग्रूमिंग का हिस्सा बन गई।
1960–70 के दशक में बदला नजरिया
1960 और 1970 के दशक में महिला अधिकार आंदोलनों के दौरान कई महिलाओं ने शरीर के बाल हटाने की परंपरा का विरोध किया।उनका तर्क था कि महिलाओं पर सुंदर दिखने का अनावश्यक सामाजिक दबाव डाला जाता है और यह पूरी तरह व्यक्तिगत पसंद का विषय होना चाहिए।इस दौर में प्राकृतिक रूप को अपनाने की भी एक बड़ी लहर देखने को मिली।
आज का दौर: पसंद व्यक्तिगत, विकल्प अनेक
आज महिलाओं के पास पहले से कहीं अधिक विकल्प मौजूद हैं—
- शेविंग
- वैक्सिंग
- शुगरिंग
- लेजर हेयर रिमूवल
- हेयर रिमूवल क्रीम
- एपिलेटर
साथ ही बड़ी संख्या में महिलाएं शरीर के बाल न हटाने का निर्णय भी ले रही हैं। फैशन और सौंदर्य विशेषज्ञ अब इस बात पर जोर देते हैं कि शरीर के बाल हटाना या न हटाना पूरी तरह व्यक्तिगत निर्णय है।
सोशल मीडिया ने बदली सोच
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया ने इस विषय पर खुलकर चर्चा का मंच दिया है।कई मॉडल, खिलाड़ी और कलाकार बिना शेविंग के तस्वीरें साझा कर यह संदेश दे रही हैं कि सुंदरता किसी एक मानक से तय नहीं होती। वहीं दूसरी ओर कई महिलाएं नियमित शेविंग या वैक्सिंग को अपनी पसंद और सुविधा मानती हैं।महिलाओं द्वारा शेविंग की शुरुआत आधुनिक दौर में नहीं, बल्कि हजारों वर्ष पहले प्राचीन मिस्र से हुई थी। हालांकि इसे दुनिया भर में व्यापक रूप से अपनाने में 20वीं सदी के विज्ञापन अभियानों, बदलते फैशन और सामाजिक मानकों की बड़ी भूमिका रही। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह आदत और अधिक लोकप्रिय हुई।आज स्थिति पहले से काफी अलग है। अब शेविंग किसी सामाजिक अनिवार्यता से अधिक व्यक्तिगत पसंद, सुविधा और जीवनशैली का विषय बन चुकी है। इतिहास यह बताता है कि सुंदरता के मानक समय के साथ बदलते रहे हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि हर व्यक्ति को अपने शरीर और अपनी पसंद के बारे में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार है।
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- प्राचीन मिस्र में सुंदरता का प्रतीक था बाल रहित शरीर
- यूनान और रोम में भी था चलन
- मध्यकाल में बदली सोच
- 19वीं सदी तक शेविंग सिर्फ पुरुषों तक सीमित रही
- 1900 के दशक में आया बड़ा बदलाव
- 1915 में लॉन्च हुआ पहला महिला रेजर
- मार्केटिंग ने बदली सोच
- द्वितीय विश्व युद्ध ने बढ़ाई लोकप्रियता
- 1960–70 के दशक में बदला नजरिया
- आज का दौर: पसंद व्यक्तिगत, विकल्प अनेक
- सोशल मीडिया ने बदली सोच

