
पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में इस समय एक ऐसा भयंकर राजनीतिक तूफान आया हुआ है, जिसने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के वजूद पर ही संकट के बादल मंडरा दिए हैं। साल 2026 के विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त और 15 साल पुराने सत्ता के सिंहासन से बेदखल होने के बाद अब टीएमसी पूरी तरह बिखरने की कगार पर खड़ी है। हालत यह हो चुकी है कि जो पार्टी कभी ममता बनर्जी के एक इशारे पर चलती थी, आज उसी पार्टी के भीतर बगावत की ऐसी खूनी पटकथा लिखी जा रही है जो सीधे तौर पर महाराष्ट्र के ‘शिवसेना स्टाइल’ वाले विभाजन की याद दिला रही है। चुनावी नतीजों में भाजपा को मिली 208 सीटों की प्रचंड जीत और टीएमसी के महज 80 सीटों पर सिमट जाने के बाद से नेताओं और कार्यकर्ताओं का गुस्सा सातवें आसमान पर है। अंदरूनी कलह का आलम यह है कि ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई विधायक दल की बेहद अहम बैठक का 80 में से लगभग 60 विधायकों ने पूरी तरह बहिष्कार कर दिया, जिसके कारण बैठक को आनन-फानन में रद्द करना पड़ा। यह इस बात का साफ संकेत है कि ममता बनर्जी अब अपनी ही पार्टी पर नियंत्रण खोती जा रही हैं। टीएमसी के भीतर सुलग रही इस बगावत की सबसे बड़ी वजह ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी और उनकी कॉरपोरेट स्टाइल वाली चुनाव रणनीतिकार कंपनी आईपैक (I-PAC) का बढ़ता वर्चस्व है। पार्टी के पुराने, वरिष्ठ नेताओं और जमीनी कैडर में इस बात को लेकर भयंकर नाराजगी है कि अभिषेक बनर्जी के इशारे पर वर्षों से खून-पसीना बहाने वाले वफादार नेताओं को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। कार्यकर्ताओं का खुला आरोप है कि आईपैक ने पूरे संगठन को हाईजैक कर लिया और जमीनी हकीकत को जाने बिना एसी कमरों में बैठकर 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए, जिनमें से नए उतारे गए 51 उम्मीदवार बुरी तरह चुनाव हार गए। इसके साथ ही, स्कूल भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी और कट-मनी जैसे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों ने पार्टी की छवि को मटियामेट कर दिया। रही-सही कसर अभिषेक बनर्जी के बहुचर्चित ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ की करारी हार ने पूरी कर दी, जिसके बाद फाल्टा और डायमंड हार्बर नगर पालिका के कई पार्षदों ने सामूहिक इस्तीफे देकर यह साफ कर दिया कि अब जनता का गुस्सा सीधे ममता की बजाय अभिषेक बनर्जी पर निकल रहा है।
इस टूट की पटकथा को अमलीजामा पहनाने के लिए पर्दे के पीछे एक बहुत बड़ा खेल चल रहा है। कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किए गए बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने कोलकाता के ईएम बाईपास स्थित एक आलीशान होटल में लगभग 50 से अधिक असंतुष्ट विधायकों के साथ कई गुप्त बैठकें की हैं। यह बागी गुट दलबदल विरोधी कानून की अयोग्यता से बचने के लिए जरूरी दो-तिहाई यानी 53 विधायकों का जादुई आंकड़ा जुटाने के बेहद करीब है और खुद को ‘असली तृणमूल’ घोषित करने की पूरी तैयारी में है। बगावत सिर्फ विधायकों तक सीमित नहीं है; सात नगर निकायों के 100 से अधिक पार्षदों ने सामूहिक रूप से पार्टी छोड़ दी है। सांसद काकोली घोष दस्तीदार, शांतनु सेन और अरूप चक्रवर्ती जैसे कद्दावर नेताओं ने संगठनात्मक पदों से इस्तीफे दे दिए हैं, जबकि मनोज तिवारी और राज चक्रवर्ती जैसे बड़े चेहरों ने टीएमसी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है। हद तो तब हो गई जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम वाले आधिकारिक पत्र पर कई विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर पाए गए, जिसकी जांच अब खुद सीआईडी कर रही है और इस सिलसिले में अभिषेक बनर्जी को भी समन भेजा गया है। चौतरफा घिरीं ममता बनर्जी ने इस बगावत के बाद सोशल मीडिया पर लाइव आकर अपना दर्द और गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने सीधे तौर पर भाजपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वह पुलिस का खौफ दिखाकर, केंद्रीय एजेंसियों की धौंस जमाकर और पैसों की भारी रिश्वत देकर टीएमसी के विधायकों को डरा-धमका रही है। ममता ने पश्चिम बंगाल के मौजूदा हालातों की तुलना हिटलर के राज से करते हुए बागी नेताओं को अवसरवादी करार दिया और कहा कि जो लोग सिर्फ सत्ता की मलाई खाने आए थे, उनके जाने से पार्टी और मजबूत होगी क्योंकि टीएमसी नेताओं की नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं की पार्टी है। दूसरी तरफ, बंगाल के नए मुख्यमंत्री और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने ममता के सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि टीएमसी अपने ही कर्मों और आंतरिक भ्रष्टाचार के बोझ तले टूट रही है। हालांकि, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने साफ कर दिया है कि वे टीएमसी के इन बागियों को अपनी पार्टी में शामिल करने को लेकर बेहद सतर्क हैं और उनके लिए भाजपा के दरवाजे बंद हैं, क्योंकि जनता ने टीएमसी के भ्रष्टाचार के खिलाफ वोट दिया है। फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति उस मुहाने पर आकर खड़ी हो गई है जहाँ ममता बनर्जी के राजनीतिक साम्राज्य का भविष्य दांव पर लगा हुआ है।
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