
लखनऊ उत्तर प्रदेश की सियासत में बयानों के तीर इस कदर तीखे हो चुके हैं कि अब मर्यादा और शालीनता की सीमाएं पूरी तरह लांघ दी गई हैं। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर शुरू हुआ ‘टोंटी’ का विवाद अब व्यक्तिगत हमलों, पारिवारिक इतिहास और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तक जा पहुँचा है। सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने जब मंच से बिना नाम लिए जल संरक्षण की बात करते हुए ‘टोंटी चोरी’ का जिक्र कर मंद-मंद मुस्कुराया, तो किसी ने नहीं सोचा था कि इसका पलटवार इतना भीषण और आक्रामक होगा। समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस तंज को सीधे अपने स्वाभिमान पर लेते हुए मुख्यमंत्री पर ऐसा चौतरफा हमला बोला है, जिसने सूबे के राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। अखिलेश यादव ने न सिर्फ मुख्यमंत्री की भाषा शैली पर सवाल उठाए, बल्कि उनके अतीत, उनके मूल नाम अजय सिंह बिष्ट, उनके पारिवारिक व्यवसाय और यहाँ तक कि गोरखनाथ मठ के उत्तराधिकार की प्रक्रिया को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह पलटवार महज एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक बेहद निजी और तीखा हमला है, जिसने यूपी की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है। अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के तंज का जवाब देने के लिए विज्ञान और मनोविज्ञान का सहारा लेते हुए बेहद गंभीर टिप्पणियाँ की हैं। उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल से मोर्चा खोलते हुए लिखा कि विज्ञान स्पष्ट रूप से कहता है कि किशोरावस्था में किसी वनस्पति का अत्यधिक सेवन करने से व्यक्ति के सोचने, समझने और बोलने की क्षमता पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही उन्होंने मनोविज्ञान का हवाला देते हुए कहा कि इंसान के बचपन और किशोरावस्था के अनुभव उसके आने वाले जीवन में उसकी भाषा, उसके व्यवहार और उसके संपूर्ण व्यक्तित्व पर एक अमिट छाप छोड़ देते हैं। यही संस्कार और यही अनुभव आगे चलकर उसके सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में भी साफ दिखाई देने लगते हैं। अखिलेश ने इसी मनोवैज्ञानिक आधार को जोड़ते हुए मुख्यमंत्री के लिए बेहद कड़े शब्द ‘करप्ट माउथ’ यानी भ्रष्ट जुबान का इस्तेमाल किया। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री की इस भाषिक अभद्रता और कटुता की वजह शायद उनका यही अतीत और उनके अनुभव हैं, जिसे आम जनता से छिपाकर या दबाकर रखा गया है।

इस हमले को और ज्यादा आक्रामक बनाते हुए अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अतीत के उन पन्नों को खंगालना शुरू कर दिया, जिन पर आमतौर पर सार्वजनिक मंचों पर चर्चा नहीं होती। उन्होंने मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए दावा किया कि सन उन्नीस सौ चौरानवे के आसपास, जब मुख्यमंत्री का नाम अजय सिंह बिष्ट हुआ करता था, तब वे अपने पारिवारिक परिवहन के व्यवसाय में हाथ बंटा रहे थे। उस समय उनके पास तीन बसें और एक ट्रक हुआ करता था। अखिलेश ने सीधे निशाना साधते हुए कहा कि संभवतः मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक मंचों पर इस्तेमाल की जाने वाली यह अभद्र और कटु भाषा उसी दौर में सीखी है, जब वे डग्गामार यानी अवैध रूप से वाहन चलवाने का काम देखते थे। परिवहन व्यवसाय के उस माहौल की भाषा आज भी उनके व्यवहार में झलकती है। यह हमला सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की छवि को एक संन्यासी और एक बड़े मठाधीश से हटाकर एक सामान्य और विवादित अतीत वाले व्यक्ति के रूप में पेश करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है।
बात सिर्फ अतीत के व्यवसाय तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे संवेदनशील और पूजनीय केंद्रों में से एक, गोरखनाथ मठ के आंतरिक मामलों और उसके उत्तराधिकार पर भी सीधे उंगली उठा दी। उन्होंने पारिवारिक रिश्तों का गणित समझाते हुए कहा कि अजय सिंह बिष्ट के पिता श्री आनंद सिंह बिष्ट और गोरखनाथ मठ के पूर्व महंत श्री अवैद्यनाथ जी, जिनका मूल नाम श्री कृपाल सिंह बिष्ट था, वे दोनों रिश्ते में सगे भाई बताए जाते हैं। इसी नाते से बाद में उनके चाचा ने उन्हें मठ में बुला लिया और महज कुछ ही वर्षों के भीतर महंत अवैद्यनाथ जी ने अपने सगे भतीजे अजय सिंह बिष्ट को इतने बड़े और प्रतिष्ठित मठ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। अखिलेश ने इस पूरी प्रक्रिया पर एक बड़ा राजनीतिक और नैतिक सवाल खड़ा करते हुए पूछा कि आखिर उत्तराधिकारी के रूप में उन्हीं को क्यों चुना गया? क्या यह निर्णय वाकई केवल योग्यता और अध्यात्म के आधार पर लिया गया था या फिर इसके पीछे उनके पारिवारिक और सगे रिश्तों का गहरा प्रभाव था? अखिलेश यादव यहीं नहीं रुके, उन्होंने इस उत्तराधिकार की तुलना सीधे भाजपा द्वारा लगाए जाने वाले ‘परिवारवाद’ के आरोपों से कर दी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मठ में महंत को चुनने के लिए किसी भी तरह की औपचारिक, पारदर्शी या लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया का पालन किया गया था? जो व्यक्ति महज चार साल पहले तक डग्गामार वाहन चलवाने के काम में लगा हुआ था, वह अचानक चार वर्षों के भीतर इतना योग्य और आध्यात्मिक कैसे हो गया कि उसे इतने बड़े मठ की गद्दी सौंप दी गई? अगर ऐसा नहीं था, तो क्या इसे पूरी तरह से ‘पक्षपाती परिवारवाद’ का सबसे बड़ा उदाहरण नहीं माना जाना चाहिए? उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पहले रिश्तों के दम पर मठ की गद्दी हासिल हुई और फिर कुछ ही वर्षों के भीतर लोकसभा की सुरक्षित और प्रतिष्ठित सीट भी मिल गई। अखिलेश ने अपने हमले के अंत में एक बेहद गहरी और दार्शनिक सी दिखने वाली लेकिन तीखी बात कही कि सत्ता की ताकत, बड़ा पद और भगवा परिधान तो समय की लहरों और पारिवारिक रिश्तों की मदद से किसी को भी मिल सकते हैं, लेकिन एक गरिमापूर्ण भाषा और मर्यादित व्यवहार कभी भी पैतृक संपत्ति या सिफारिश से हासिल नहीं किए जा सकते। पर्यावरण दिवस के एक छोटे से मजाक से शुरू हुआ यह विवाद अब यूपी की राजनीति में एक ऐसे नए और बेहद आक्रामक अध्याय में तब्दील हो चुका है, जिसकी गूंज आने वाले लंबे समय तक सुनाई देगी।
or advertisement visit our office:http://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

