RBI MPC: रेपो रेट में लगातार चौथी बार बदलाव नहीं, जानें गवर्नर मल्होत्रा ने क्यों लिया यह फैसला

Editorial
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नई दिल्ली भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने लगातार चौथी बैठक में नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं किया। बुधवार को जारी MPC के मिनट्स से साफ हुआ कि केंद्रीय बैंक जल्दबाजी में ब्याज दरों में बदलाव करने के बजाय महंगाई के रुख और वैश्विक परिस्थितियों को लेकर और स्पष्टता का इंतजार करना चाहता है।आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा के मुताबिक, मौजूदा समय में भारतीय अर्थव्यवस्था ने कई वैश्विक और घरेलू चुनौतियों के बावजूद बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि, खाद्य, ईंधन और अन्य इनपुट कीमतों में संभावित बढ़ोतरी को लेकर जोखिम अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। ऐसे में एमपीसी ने फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखना उचित समझा।

रेपो रेट में बदलाव से पहले महंगाई पर नजर

MPC के मिनट्स के मुताबिक, गवर्नर संजय मल्होत्रा का मानना है कि किसी भी आपूर्ति-पक्ष के झटके का मुकाबला करने के लिए मौद्रिक नीति में बदलाव तभी जरूरी होता है, जब उसका असर व्यापक महंगाई के रूप में दिखाई देने लगे।उनके अनुसार, यदि खाद्य या ईंधन की कीमतों में अस्थायी बढ़ोतरी होती है और उसका असर अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों तक नहीं फैलता, तो तुरंत नीतिगत प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं है। लेकिन अगर महंगाई की उम्मीदें अस्थिर होने लगें या कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का संकेत मिले, तब आरबीआई को नीतिगत कदम उठाने की जरूरत पड़ सकती है।फिलहाल ऐसे व्यापक और लगातार दबाव के पर्याप्त प्रमाण नहीं दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को अपरिवर्तित रखने का फैसला किया।

वैश्विक तनाव ने बढ़ाई अनिश्चितता

आरबीआई के सामने इस समय सिर्फ घरेलू महंगाई ही चुनौती नहीं है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उससे जुड़ी ऊर्जा कीमतों को लेकर भी केंद्रीय बैंक सतर्क है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े संघर्ष का असर कच्चे तेल की कीमतों, परिवहन लागत और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।यदि ऊर्जा कीमतों में तेज वृद्धि होती है, तो इसका असर भारत की आयात लागत पर भी पड़ सकता है। इससे महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। इसी वजह से एमपीसी किसी भी जल्दबाजी से बचना चाहती है।गवर्नर मल्होत्रा ने संकेत दिया कि केंद्रीय बैंक वास्तविक आंकड़ों के आधार पर स्थिति का आकलन करना चाहता है। महंगाई के सामान्य और स्थिर स्तर पर आने की पुष्टि होने के बाद ही भविष्य की नीतिगत दिशा को लेकर ज्यादा स्पष्ट फैसला लिया जा सकेगा।

अनियमित मानसून भी बना चिंता का कारण

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए मानसून बेहद महत्वपूर्ण है। बारिश की स्थिति का सीधा असर कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। इस साल मानसून में रही अनिश्चितता के कारण आरबीआई खाद्य महंगाई को लेकर भी सतर्क है।यदि बारिश की वजह से किसी प्रमुख कृषि उत्पाद की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो उसकी कीमत बढ़ सकती है। शुरुआत में इसका असर कुछ खाद्य वस्तुओं तक सीमित रह सकता है, लेकिन लंबे समय तक कीमतों में बढ़ोतरी रहने पर इसका असर महंगाई के व्यापक आंकड़ों पर पड़ सकता है।एमपीसी सदस्य पूनम गुप्ता ने भी वैश्विक घटनाक्रम और मौसम से जुड़े जोखिमों को देखते हुए फिलहाल इंतजार और निगरानी की रणनीति को बेहतर बताया।

भारतीय अर्थव्यवस्था ने दिखाया बेहतर प्रदर्शन

इन चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। इससे आरबीआई को कुछ राहत मिली है।गवर्नर मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितता, सप्लाई चेन में व्यवधान और मानसून से जुड़े जोखिमों के बीच भी घरेलू अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत बनी हुई है।हालांकि केंद्रीय बैंक का ध्यान अब इस बात पर है कि आने वाले महीनों में आर्थिक गतिविधियों और महंगाई का संतुलन किस दिशा में जाता है।

ब्याज दरों में बदलाव का आम लोगों पर क्या असर?

रेपो रेट वह प्रमुख दर है जिस पर आरबीआई बैंकों को अल्प अवधि के लिए धन उपलब्ध कराता है। इसमें बदलाव का असर बैंकिंग सिस्टम और आगे चलकर लोन की ब्याज दरों पर पड़ सकता है।अगर रेपो रेट बढ़ता है तो आम तौर पर कर्ज महंगा होने की संभावना रहती है। वहीं, रेपो रेट में कटौती से होम लोन, कार लोन और अन्य कर्ज की ब्याज दरों में राहत मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है।फिलहाल दरों में बदलाव नहीं होने का मतलब है कि बैंकिंग व्यवस्था में मौजूदा नीतिगत रुख बरकरार रहेगा। हालांकि, व्यक्तिगत लोन या होम लोन की वास्तविक ब्याज दरें संबंधित बैंक और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं।

आगे क्या करेगा RBI?

MPC के मिनट्स से संकेत मिलता है कि आने वाले समय में आरबीआई महंगाई के आंकड़ों, कच्चे तेल की कीमतों, मानसून, वैश्विक घटनाक्रम और घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर करीबी नजर रखेगा।गवर्नर मल्होत्रा के मुताबिक, अगर महंगाई स्थिर रहती है और आपूर्ति-पक्ष से आने वाले जोखिम सीमित रहते हैं, तो मौजूदा नीति रुख को जारी रखा जा सकता है। दूसरी ओर, यदि खाद्य और ईंधन कीमतों का दबाव व्यापक महंगाई में बदलता है, तो केंद्रीय बैंक आगे नीतिगत कदम उठाने पर विचार कर सकता है।आरबीआई का लगातार चौथी बार रेपो रेट में बदलाव न करना इस बात का संकेत है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल ‘देखो और इंतजार करो’ की रणनीति अपना रहा है। अर्थव्यवस्था की मजबूती आरबीआई के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन वैश्विक तनाव, ऊर्जा कीमतों और मानसून से जुड़े जोखिमों के कारण सतर्कता जरूरी है। आने वाले महीनों के महंगाई आंकड़े और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां ही तय करेंगी कि आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति किस दिशा में जाती है।

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